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बादलों के बीच सूरज

बादलों के बीच सूरज घिर गया है |   हँस रहा है मुग्ध मानस , झील का ऊँचा किनारा , ढूँढ़ता नीले गगन के , किरणमय सारे दियारा , धूप का झुमका चमाचम गिर गया है |   पर्वतों की चोटियों पर , है अँधेरा कुछ घना सा , किरण का जाना वहाँ , है हो गया बिलकुल मना सा , व्यंग्य वाणों से कलेजा चिर गया है |   किस परी के देश में वह , समय का घोड़ा गया है , एक भी चिड़िया नहीं है , उड़ कहीं उलझा बया है , लहर लहराती नहीं , मल थिर गया है |   पर्यटन के गाँव में है , एक छतरी का बसेरा , कुशलतापूर्वक जगा है , साँझ से सोया सबेरा , कमल ललछौहाँ खिला , दिन   फिर गया है |

कोहरा कोरोनिया है

आज के दुष्कर समय को , स्वयं घर में बंद रहकर , सौम्यता से , कुछ दिनों तक काटना है |   घूमना , बाहर निकलकर टहलना तक , है मना , कोहरा कोरोनिया है , विश्व में छाया घना , फट चुकी यादों की लुगरी , शब्द की शुचि सूइयों से उल्लसित हो , अर्थत : ही तागना है |   उड़ रहे संदेश जो अब , जाँचकर है मानना , संयमी अनुपम चँदोवा , गगन तक है तानना , समझना है यह कि , यह तो है अकालिक और अस्थिर ,   एक विपदा , प्रकृति की यह यातना है |   सोचना है , मन पड़ा है , योग की प्रिय कंदरा में , स्वर पिरोने जा रहा है , लय समन्वित अंतरा में , भावप्रद अनुभूतियों की , यह अलौकिक , मानवीया , तारतम्यिक , भाववाही साधना है |   जो नियंत्रण में नहीं है , है नहीं कोई दवाई , स्वास्थ्य की चिंता लगी है , हिचकियाँ लेती सचाई , इस अवांछित युद्ध में हर आदमी योद्धा बना है , हर किसी का ,   हर किसी से सामना है |

कोरोना की करुण कथाएँ

ऐसा पहले नहीं हुआ जो , एक अपरिचित सन्नाटा है , गाँवों - गाँवों , शहरों - शहरों |   बंद चिमनियाँ , गाड़ी - छकड़े , बंद पड़ीं शिक्षण - संस्थाएँ , बंद पड़ी हैं मन्दिर - मस्जिद - गुरुद्वारे , उमड़ी आस्थाएँ , चिंताओं में डूबा है मन , घंटों - घंटों , पहरों - पहरों |   टिकट कटे ठंडे बस्तों में , संशय में अनगिन यात्राएँ , आस पास केवल रहती हैं , कोरोना की करुण कथाएँ , एक अनोखा डर फैला है , सड़कों - सड़कों , डहरों - डहरों |   आँखों की पलकों तक उतरी , सावन - भादों वाली बरसा , फागुन के दिन गए न लौटे , आए हुए , हुआ है अरसा , आश्चर्यों की गाथा अद्भुत , नदियों - नदियों , लहरों - लहरों |   उड़ी हवाओं की चरचा है , खतरे में हैं गली - मुहल्ले , पीले - पीले हरे - हरे हैं , वट - अशोक के फूटे कल्ले , है वसंत भी दहला - दहला , बरगद - बरगद , रहरों - रहरों |

बाकी तो सब ठीक-ठाक है

कैसे आएँ गाँव ‘ चतुर्भुज ’ ! रेल - मार्ग भी बंद पड़ा है , बसें न चलतीं , आवाजाही बंद पड़ी है , ठीक - ठाक सब , घर पर है न !   दस से दो तक बैंक खुल रहे , सामाजिकता की भी दूरी , आटा - चावल की दुकान पर , लंबी लाइन की मजबूरी , सब्जीवाले जब - तब आते , और दूध की लड़ा - लड़ी है |   शहर किलाबंदी के जैसा , चुप्पी साधा अगल बगल है , कालोनी है घरबंदी में , धूपछाँह की चहल - पहल है , सहमे - सहमे चौक - चौपलें , दुर्दिन की यह अजब घड़ी है |   चारोंओर सशंकित हैं स्वर , आतंकित है कोना - कोना , शेयर - पूँजी उथल पुथल है , संकट में हैं चाँदी - सोना , सर्दी - ज्वर - खाँसी का होना , कोरोना की जुडी कड़ी है |   घर में रहना आवश्यक है , यही असुविधा यही असर है , पड़ा शहर के एक किनारे , छोटा सा यह अपना घर है , सदा हाथ साबुन से धोना ही बचने की एक जड़ी है |   दादी सौ के ऊपर पहुँचीं , दो दिन से बीमार पड़ी हैं , कहतीं ‘ लवकुश ’ को बुलवा दो , इसी बात पर अड़ी पड़ी हैं , बाकी तो सब ठीक - ठाक है , माँ को लानी एक छड़ी है |

गाँव के बाहर खड़े हैं

शहर से तो आ गए माँ ! भोर होते , दिन निकलते , गाँव के बाहर खड़े हैं |   एक दुविधा पल रही है , अछल मन में भय बना है , पहुँच कर भी घर न आना , संक्रमण - बादल घना है , छींक आती हैं निरंतर , दर्द से सिर फट रहा है , है मना , इससे अड़े हैं |   भूख की चिंता न करना , पैर में सूजन अधिक है , इधर आता ही न कोई , गाँववाला या पथिक है , रात भर पैदल चले हैं , अलग है संकोच मन में , और पीपल तर पड़े हैं |   डर कोरोना का अतर्कित , देश में हलचल मची है , वायरस की यह कहानी , क्यों रची ? क्योंकर रची है ? विश्व संकट में पड़ा है . है बचा कोई न चारा , पैर में पत्थर जड़े हैं |     भेज देना शाम को बस ! चार रोटी , गरम पानी , चटपटा कुछ , हरा मिरचा , और गुड़ - भेली सुहानी , एक बोतल मठा भी हो , आ नहीं सकते कि घर में , ऊम्र में सारे बड़े हैं |

खेत पके होंगे गेहूँ के

खेत पके होंगे गेहूँ के गाँव चले हम , करनी - बसुली - कटिया करने , अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |   शहर बंद है , बैठे - बैठे तंग करेगी भूख - मजूरी , तंग करेंगे हाथ - पैर ये , सामाजिकता की वह दूरी , ठेला पड़ा रहेगा घर में , गाँव चले हम , आलू - मेथी - धनिया करने अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |   छुआ - छूत सड़कों तक उतरी , और चटखनी डरा रही है , मिलना - जुलना बंद हुआ है , गौरैया भी परा रही है , शंका में जब मानवता है , गाँव चले हम , छानी - छप्पर - नरिया करने , अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |   मुँह पर मास्क लगा हर कोई , साँसों की चिंता करता है , स्वयं सुरक्षितता की खातिर , आचारिक हिंसा करता है , इन सामाजिक बदलावों से , गाँव चले हम , चौका - बासन - खटिया करने , अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |   स्वाभिमान की हम खाते हैं , नहीं किसी की मदद चाहिए , एक माह का राशन - पानी , एक हजारी नगद चाहिए , हम अपने मन के मालिक हैं , गाँव चले हम , बुधई - बुधिया - हरिया करने , अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |