गाँव के बाहर खड़े हैं
शहर से तो आ गए माँ !
भोर होते, दिन निकलते,
गाँव के बाहर
खड़े हैं |
एक दुविधा पल
रही है,
अछल मन में भय
बना है,
पहुँच कर भी
घर न आना,
संक्रमण-बादल घना है,
छींक आती हैं
निरंतर,
दर्द से सिर
फट रहा है,
है मना, इससे अड़े हैं |
भूख की चिंता न
करना,
पैर में सूजन
अधिक है,
इधर आता ही न कोई,
गाँववाला या
पथिक है,
रात भर पैदल
चले हैं,
अलग है संकोच
मन में,
और पीपल तर पड़े
हैं |
डर कोरोना का
अतर्कित,
देश में हलचल
मची है,
वायरस की यह
कहानी,
क्यों रची ? क्योंकर रची है ?
विश्व संकट
में पड़ा है.
है बचा कोई न
चारा,
पैर में पत्थर
जड़े हैं |
भेज देना शाम
को बस !
चार रोटी, गरम पानी,
चटपटा कुछ, हरा मिरचा ,
और गुड़-भेली सुहानी,
एक बोतल मठा
भी हो,
आ नहीं सकते
कि घर में,
ऊम्र में सारे
बड़े हैं |
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें