खेत पके होंगे गेहूँ के

खेत पके होंगे गेहूँ के

गाँव चले हम,

करनी-बसुली-कटिया करने,

अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |

 

शहर बंद है, बैठे-बैठे

तंग करेगी भूख-मजूरी,

तंग करेंगे हाथ-पैर ये,

सामाजिकता की वह दूरी,

ठेला पड़ा रहेगा घर में,

गाँव चले हम,

आलू-मेथी-धनिया करने

अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |

 

छुआ-छूत सड़कों तक उतरी,

और चटखनी डरा रही है,

मिलना-जुलना बंद हुआ है,

गौरैया भी परा रही है,

शंका में जब मानवता है,

गाँव चले हम,

छानी-छप्पर-नरिया करने,

अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |

 

मुँह पर मास्क लगा हर कोई,

साँसों की चिंता करता है,

स्वयं सुरक्षितता की खातिर,

आचारिक हिंसा करता है,

इन सामाजिक बदलावों से,

गाँव चले हम,

चौका-बासन-खटिया करने,

अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |

 

स्वाभिमान की हम खाते हैं,

नहीं किसी की मदद चाहिए,

एक माह का राशन-पानी,

एक हजारी नगद चाहिए,

हम अपने मन के मालिक हैं,

गाँव चले हम,

बुधई-बुधिया-हरिया करने,

अरे ! कोरोना ! तुझे नमस्ते |

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