ठण्ड हुई शहराती
छोड़छाड़कर पुश्तैनी घर,
ठण्ड हुई
शहराती |
कुहरे-पाले ने रोकें हैं
आमदनी के धंधे,
कड़ी ठण्ड में
सिहर रहे हैं,
रोजगार के
कंधे,
करे कँपकँपी
सर्द हवा से,
रह-रह ठकुरसुहाती |
दिन लगते हैं
रात सरीखे,
सूरज जैसे
चंदा,
बढ़ई के हाथों
का ठिठुरा,
लकड़ी का भी
रंदा,
बिजली-चमकौवल से डरती,
ढिबरी की
सँझवाती |
गिरा मनाली से
भी नीचे,
दिल्ली का है
पारा,
टूटा
कीर्तिमान दशकों का,
अभिलेखों का
सारा,
सात दिनों के
लिए चढ़ी है,
लगता, साढ़ेसाती |
खेतों की
रखवाली करता,
काँप रहा है
हलकू,
जमा हुआ पानी
है पीता,
टोंटी का हर
नलकू,
पथरौड़े के पास
हथेली,
गोबर है चिपकाती |
बहुत बढ़िया नवगीत दादा ।
जवाब देंहटाएंआभार भाई
हटाएंवाह लाजबाब
जवाब देंहटाएंआभार बन्धु
हटाएंउत्तम
हटाएंभारत के गांवों का सार्थक चित्रण ।
जवाब देंहटाएंआभार मान्यवर
हटाएंविनोद गगरानी मंदसौर।
जवाब देंहटाएंआभार भाई विनोद जी
हटाएंगांव के इर्द गिर्द बुना नवगीत लोक शब्दावली में एक श्रेष्ठ रचना के लिए शत शत-शत बधाईयाँ डॉ जयजयराम आनंद भोपाल
जवाब देंहटाएंआभार आदरणीय // आपका अपार स्नेह //प्रणाम
हटाएंश्रेष्ठ
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएं