ठण्ड हुई शहराती

छोड़छाड़कर पुश्तैनी घर,

ठण्ड हुई शहराती |

 

कुहरे-पाले ने रोकें हैं  

आमदनी के धंधे,

कड़ी ठण्ड में सिहर रहे हैं,

रोजगार के कंधे,

करे कँपकँपी सर्द हवा से,

रह-रह ठकुरसुहाती |

 

दिन लगते हैं रात सरीखे,

सूरज जैसे चंदा,

बढ़ई के हाथों का ठिठुरा,

लकड़ी का भी रंदा,

बिजली-चमकौवल से डरती,

ढिबरी की सँझवाती |

 

गिरा मनाली से भी नीचे,

दिल्ली का है पारा,

टूटा कीर्तिमान दशकों का,

अभिलेखों का सारा,

सात दिनों के लिए चढ़ी है,

लगता, साढ़ेसाती |

 

खेतों की रखवाली करता,

काँप रहा है हलकू,

जमा हुआ पानी है पीता,

टोंटी का हर नलकू,

पथरौड़े के पास हथेली,

गोबर है चिपकाती |

टिप्पणियाँ

  1. भारत के गांवों का सार्थक चित्रण ।

    जवाब देंहटाएं
  2. गांव के इर्द गिर्द बुना नवगीत लोक शब्दावली में एक श्रेष्ठ रचना के लिए शत शत-शत बधाईयाँ डॉ जयजयराम आनंद भोपाल

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अरे ! बादलो !!

कोरोना की करुण कथाएँ