खेत पके होंगे गेहूँ के-अनुभूति का रसायन
प्रस्तुत हिन्दी काव्य संग्रह, अन्य विविध काव्य संग्रहों से अन्यतम है | मानव–मन के सरसता को ग्रहण किये हुए यह काव्य संग्रह अपनी सौरभ झंकृत स्वर लहरी से सभी को आह्लादित करने में पूर्ण सक्षम होगा, ऐसी मेरी मान्यता है | कवि की अनुभूति अंतस और हृदय की गहराई में पहुँच कर, जब उसमें से उर्वर रसायन को सभी के समक्ष परोसती है तो उसे आस्वादित करने वाला, उस रसायन के खुमार में इतना सराबोर हो जाता है कि उसे स्वयं की भी खबर नहीं रहती और वह उस आनंदानुभूति को आस्वादित करते हुए जीवन की सार्थकता को द्योतित करता है, परन्तु ऐसा रसास्वादन वही कर सकता है, जिसके पास रस ग्राह्यता की शक्ति निहित हो | यदि कविता के शब्द और पंक्तियाँ भाव को धारण किये हुए नृत्य करती हुई, अनुभूति को प्राप्त हों ,तो कहा जा सकता है कि वह एक सार्थक साहित्य की अवधारणा है या काव्य की सार्थकता मानी जानी चाहिए | यह बात अलग है कि सभी के विचार-सिद्धांत एवं रसानुभूति एक जैसी नहीं होती फिर भी सच्चा काव्य मनुष्य को भावों से भर ही देता है और जिस शक्ति से उसका यह अवयव प्रकट होता है, उसी के द्वारा उसकी मूल्यवत्ता को परखा जा सकता है |
हर मनुष्य साहित्य
को अपने दृष्टिकोण से ग्रहण करता है और करना चाहता है | इसी प्रकार साहित्यकार भी अपने
साहित्यपन को अपनी अनुभूति एवं समय–परिवेश के आधार पर कार्यान्वित करता है | यह बाद अलग है कि
देखने वाला अपने ही दृष्टिकोण से किसी को अवलोकित करके मूल्यांकन करता है | दृष्टि सृजनकर्ता
एवं मूल्याङ्कनकर्ता दोनों के पास है किन्तु सोच दोनों की भिन्न होती है और समयानुरूप
परिवर्तन भी बहुत कुछ दृष्टि और दृष्टान्त को अलग कर देता है | काव्य सृजन करना
कोई आसान कार्य नहीं होता है, उसमें सृजनकर्त्ता के पास प्रतिभा के साथ–साथ निपुणता एवं अभ्यास की परम आवश्यकता होती है और वह अपने
मर्मभेदी दृष्टि से वह दृश्य अवलोकित कर लेता है, जो सामान्य जनसाधारण नहीं कर पाता | कवि द्रष्टा और
स्रष्टा दोनों होता है | इसीलिए वह लोक व्यवहार को धारण करने पर भी अनुभूति से अन्यतम होता है |
नवगीतकार शिवानन्द
सिंह ‘सहयोगी’ का काव्य सृजन
हमेशा एक नवीन रस में ढला हुआ, मिट्टी की सोंघी गंध सदृश सुवासित होता हुआ, लोक को अलंकृत करता है | इनकी रचना में लोक
की व्यावहारिकता का रंग हमेशा ही चढ़ा होता है | आपके प्रस्तुत काव्य संग्रह में भी एक नवीन आनुभूतिक तत्त्व
का दर्शन किया जा सकता है, जो वर्तमान में भोगे हुए अपने अंतर्द्वन्द्व एवं नवीन जिजीविषा को प्रदान करने
की शक्ति को धारण किये हुए है | इस काव्य संग्रह में लगभग 73 कविताएँ संगृहीत हैं, जिसे कवि ने अपनी ओजस्वी प्रतिभा द्वारा उर्जित करने का सराहनीय प्रयास किया
है | यदि मेरे शब्दों
में कहा जाए तो यह काव्य संग्रह “अनुभूति का रसायन” है , जिसे कवि ने अपने
अन्तर्मन से समयानुरूप काव्य के रूप में रोपित किया है | उनका यह काव्य
संग्रह वर्तमान में कोरोना नामक बीमारी से आहत एवं शहर से लौटे हुए गरीब देहाती
बच्चे की करुण पुकार भी है | कवि ने विविध बिम्बों एवं प्रतीकों के माध्यम से इस काव्य संग्रह में एक आनुभूतिक
सत्य को उजागर करने का प्रयास किया है | शहर हो या गाँव , कवि सभी से सम्बंधित है और वह गाँव एवं शहर की उस परछाईं को भी अवलोकित कर
लेता है , जो अन्य साधारण जन
नहीं कर पाते |
नवगीतकार ने
प्रस्तुत काव्य संग्रह में खड़ीबोली के साथ–साथ गाँव एवं कसबों से उत्पन्न शब्दों का प्रयोग भी इस काव्य संग्रह में
प्रयोग किया है | उसने ऐसे शब्दों का
भी प्रयोग किया, जिसे सुनने के लिए
गाँव के परम्परावादी बुजुर्ग लालायित रहते हैं | पूरे काव्य संग्रह में कहीं भी शब्दों की छटपटाहट को
नहीं देखी जा सकती है, ऐसा लगता है जैसे शब्द खुद ही चलकर अनुरोध पूर्वक काव्य सृजन में अपनी उपस्थति
को दर्ज कर लिए हों | कहीं–कहीं अंग्रेजी के भी
व्यवहार में चलित शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो काव्य को सरल बनाने में सहयोगी भी है | वैसे तो इस काव्य
संग्रह में अनुप्रास –उपमा एवं दृष्टान्त का प्रयोग कई जगहों पर दिखाई देता है किन्तु मानवीकरण
अलंकार की छटा बहुत ही शोभनीय है | यथा-
“करते प्राणायाम झुके सब
बिजली के खम्भे
साँप पेड़ के कंधों पर हैं
भरे पड़े भम्भे
कहता कथा प्रदूषण का वह
ग्रामज उपला है |”
कवि ने अपने इस काव्य संग्रह में आधुनिक व्यवस्था पर भी गहरा कुठाराघात किया
है , जो आज के समय–परिवेश में
जानबूझकर सुप्तावस्था धारण करने वालों को जागृत करने का प्रयास करता है | यथा–
“रोजगार कार्यालय में हल
कहाँ निकलता है?
जमा हुआ हिमखंड भूख का
कहाँ पिघलता है ?
बिजली के भी उजियारों में
सब गुपचुप है |”
प्रस्तुत काव्य
संग्रह में गँवई गंध को आत्मसात् करने का अवसर बहुत ही अनूठे ढंग से प्राप्त हो
सकता है | यदि पाठक सजग तथा
सरस हो तो वह किसी भी साहित्यिक सृजन में आनंदानुभूति के सागर में खुद को तरंगित
करने से अलग नहीं होना चाहेगा | ग्रामीण बोलचाल की भाषा–बोली का मजा ही कुछ और होता है | यथा-
“जोरन थर-थर काँप रही है
लगे अलाव जलाने कंडे |”
प्रस्तुत काव्य संग्रह में ज्यादातर मानवीकरण अलंकार की चासनी को चखा जा सकता
है, शर्त यह है कि पाठक
को काव्यशास्त्र की जानकारी अवश्य हो | कवि ने अपने इस संग्रह में व्यंजना का अद्भुत प्रयोग किया है, जो सामान्य कवि के
लिए सहज नहीं है | काव्य संग्रह को आत्मसात् करके कवि की अनुभूति की प्रवणता को देखा जा सकता है
तथा उसके द्वारा तद्युगीन एवं वर्तमान के परिवेशगत जीवन को आसानी से देखा एवं परखा
जा सकता है | काव्य सृजन में
मुझे व्यक्तिगत रूप से कहीं भी अतिमानिता प्रभावी नहीं दिखती, जबकि ज्यादातर
साहित्यकारों के साहित्य सृजन में इसका प्रभाव कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में
झलकता रहता है | कवि के काव्य में अतिमानिता
का न होना , काव्य को श्रेय से
जोड़ता है, इसीलिए प्रस्तुत
काव्य संग्रह साहित्य लोक के लिए निश्चित रूपेण श्रेयस्कर होगा, ऐसा मेरा चिंतन है | काव्य संग्रह में
प्रकृति की सुन्दरता का चित्रण भी अनोखा है, जो अन्य कवियों की तुलना में अन्यतम है | सुधी मन तथा मानव की बात कवि ने सुधी अक्षरो के माध्यम से व्यंजित करने का
प्रयास किया है , क्योंकि जगत् की
सच्चाई से कवि परिचित है , इसलिए सुधी शब्द निश्चित रूप से उसके काव्य संग्रह की विसंगतियों से रक्षा
करेगा , ऐसा मेरा मानना है | कबीरदास ने भी जगत्
के लोगों के व्यवहार को परखा था तथा उन्हें पता था की सज्जन की अपेक्षा दुर्जन
व्यक्तित्व वाला व्यक्ति किसी श्रेयस्कर कार्य को बाधित करने का पूर्ण प्रयास करता
है, इसलिए उन्होंने
अपने काव्य में “सुनो भाई साधु” का प्रयोग खूब किया
है, जिससे पता चलता है
कि समाज में सज्जनों को जागृत करने की आवश्यकता है और उन्हीं के माध्यम से लोक का
कल्याण वर्द्धित हो सकता है | प्रस्तुत काव्य संग्रह में भी कविता की पंक्तियों को पढ़कर तह को समझा जा सकता
है | “बढ़ते शहर सिमटते कसबे” को कवि ने अपनी सृजनशीलता में पिरोया है | इसके माध्यम से वह यह बताना चाहता है गाँव या कसबे का
व्यक्ति बिना कुछ सोचे–समझे चाकरी के लिए शहर के लिए पलायन कर रहे हैं , निश्चित रूप से ऐसे
व्यक्तिओं के अन्दर परख नहीं है | वे गँवई रंग को उतार कर विलासिता और उपभोक्तावादी संस्कृति में खुद को झोंक
देते हैं, जिसका परिणाम यह
होता है कि वें न गाँव के रह जाते हैं और न शहर के | दूसरी बात यह भी है की कसबे का आदमी खुद के कसबे का
विकास न करके शहर के विकास में योगदान देने हेतु तत्पर रहता है और इसके बदले उसे
जीने के लिए चार पैसे और शहर की चकाचौंध प्राप्त होती है , जिसमें वह
चौंधियाया हुआ होकर अपने जीवन को ऐसे गर्त में धकेल देता है, जहाँ से निकलना
मुश्किल हो जाता है | शहर का बढ़ना प्रकृति के लिए भी घातक सिद्ध हो रहा है , क्योंकि साधन
सम्पन्नता तो प्राप्त हो रही है लेकिन इसके लिए प्रकृति को लूटा जा रहा है, जिससे प्राकृतिक
असंतुलन पैदा हो रहा है | इससे जीवन आहत हो रहा है और उसकी सार्थकता निरर्थकता में परिवर्तित होती दिखाई
पड़ती है | साहित्यकार इन सभी
तथ्यों से परिचित है, इसीलिए वह अपनी साहित्यिकता में व्यंजना के माध्यम से सब कुछ प्रकट कर देता है
|
नवगीतकार शिवानन्द
सिंह “सहयोगी” के काव्य सृजन में
हमेशा एक नया एवं अनूठा प्रयोग देखने को प्राप्त होता है | उनके सृजन का लय
हमेशा एक जैसा नहीं होता है | साहित्य की कारीगरी में वे निष्णात हैं | उनका अनुभव और अनुभूति दोनों प्रवण एवं प्रणव हैं | उनकी कविताओं को
आत्मसात् करके ऐसा लगता है कि साहित्य का सबसे मीठा रसायन उन्हीं के काव्य सृजन
में हैं | शब्दों को जैसे
चाहते हैं, वैसे नचाते हैं, यह मेरी समझ में
उनका उत्कृष्ट कार्य है | ज्यादातर साहित्यकार शब्दों में खुद नाच जाते हैं किन्तु ‘सहयोगी जी’ उसके
विपरीत हैं | शब्द उनकी अनुभूति
के अनुसार रचना में आकर अपना स्थान एवं प्रभाव ग्रहण करता है और यही एक अच्छे
साहित्यकार की सबसे बड़ी विशेषता है किन्तु उनकी यह साहित्यिक कारीगरी
साहित्यानुरागी अथवा गाँव से सम्बंधित प्रबुद्ध व्यक्ति तो समझा सकता है किन्तु
शहर में जन्म लेने वाली सामान्य वर्तमान पीढ़ी, जो गाँव से सम्बन्धित नहीं है, उनके पल्ले नहीं पड़
जाए , इसकी सम्भावना कम
ही दिखाई पड़ती है | कवि ने प्रस्तुत काव्य संग्रह में गाँव से सम्बंधित कुछ गूढ़ शब्दों के अर्थ को
भी व्याख्यायित किया है , जो बहुत ही प्रभावी है किन्तु गँवई गंध से अलग व्यक्तित्व जो की शहरी चकाचौंध
में जीवन को डुबाए हुए हैं,उनके समझ से परे हो सकता है |
कवि ने अपने इस
काव्य संग्रह में प्रतीकों का प्रयोग भी उत्कृष्ट तरीके से किया है, जो काव्य संग्रह की
उच्चता को द्योतित करता है | काव्य संग्रह पूर्ण रूपेण अपने काव्यधर्मी मार्ग को धारण किये हुए हिन्दी गीत
एवं नवगीत को उर्जावान बनाएगा, ऐसी मेरी धारण है | नवगीतकार शिवानन्द सिंह “सहयोगी” निश्चित रूप से
सच्चे नवगीतकार हैं | डॉ. शंभुनाथ सिंह ने जिस नवगीत आन्दोलन को सक्रिय कर के गीत को एक नवीन आयाम
प्रदान किया है, उस कड़ी को बलिष्ट
बनाने का कार्य नवगीतकार शिवानन्द “सहयोगी” जी कर रहे हैं , जिससे मुझे बहुत
प्रसन्नता हो रही है , क्योंकि नवगीत की चारुता में मेरा मन नाचने लगता है और मैं हमेशा उसमें
डुबकियाँ लगाने हेतु तत्पर रहता हूँ | साहित्यकार ‘सहयोगी जी’ ने नवगीत के ऐसे बादल सजाएँ है कि उनसे सद्प्रेम की
बारिश होगी, जिसमें हम सभी
सौहार्दिक रूप से उल्लासित होकर नाचेगें और कोयल की कूक सदृश प्रकृति कूकेगी एवं
मेढक की टरटराहट सदृश गाँव झूमेगा और हृदय की संवेदना प्रेम के वशीभूत होकर अपने
चक्षु खोलेगी और कहेगी कि बहुत समय बाद किसी ने मुझे जागृत करके उपकृत किया है | यह नवगीत संग्रह
सभी के मन-मस्तिष्क को एक नवीन उत्स प्रदान करने में सक्षम होगा, ऐसी मेरी कामना है | नवगीतकार के
साहित्य-सृजन को अग्रिम शुभकामनाएँ देते हुए, मैं स्वयं को विदा करता हूँ | आप सभी के लिए साहित्यिकता का यह नवीन तोहफा है, आप इसे ग्रहण करें .....|
डॉ. भुवनेश्वर
द्विवेदी
विभागाध्यक्ष – हिन्दी
भाषा-साहित्य
हिन्दी विभाग
एस.एस.पी.पी.डी.पी.जी.कॉलेज
तिसुही, मड़िहान, मीरजापुर ,उत्तर प्रदेश
दूरभाष- 9411840151,9451152997
Email- bh.dubey13@gmail.com
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