जन-विरोध की शक्ति

भटक गई अपनी राहों से,

अक्षर की अभिव्यक्ति |

 

जनसेवा की कथा बाँचते,

जनसेवक सब पार्थ,

विज्ञापन-पट पर लेटा है,

सार्वजनिक परमार्थ,

नहीं सुरक्षित मानवीयता,

सामाजिक अनुरक्ति |

 

अपना कौशल भूल रहे हैं,

शब्दों के पंडाल,

प्रथावाद में घुस आए हैं,

नए आधुनिक व्याल,

पन्ने-पन्ने पर बदली है,

भाषाओं की भक्ति |

 

सच, उपचारित अन्नों से भी

घायल पाचन-तंत्र,

जैविक खादों की बस्ती में.

बसे रसायन-मंत्र,

रोग-निरोधक नहीं रही, वह

जीवनदायी पक्ति |

 

जनहित की बातों को वांछित,

मिला नहीं सम्मान,

बहुत हुई जनहानि, न फिर भी,

खड़े हुए हैं कान,

जनसमूह के बीच खड़ी है,

जन-विरोध की शक्ति |

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