लखनउवा कुरता

मोबाइल के टावर पर है

चढ़ा हुआ सूरज,

काम मिला है |

 

बहुत दिनों के बाद समय की

नींद अभी टूटी हो जैसे,

नई योजना डाल गई हो

बटुआ के पाकेट में पैसे,

पहना है लखनउवा कुरता  

कढ़ा हुआ सूरज,

दाम मिला है |

 

कविता का शुभ आयोजन है

शब्दों का बाजार लगा है,

अर्थ लिए सब भाव खड़े हैं

लेकिन कोई नहीं सगा है,

अवलोकन की विविध समीक्षा

पढ़ा हुआ सूरज,

खाम मिला है |

 

एक-एक अवसादित चिट्ठी

पढ़ी खोल कर लेटे-लेटे,

भाग्यवाद की लक्ष्मण-रेखा

के जितने थे दर्द समेटे,

अपना निमिष निहार रहा है

बढ़ा हुआ सूरज,

नाम मिला है |

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