नवगीत, नई कविता का एक महानगर और गीत का छोटा सा गाँव है
हिंदी साहित्य के वर्तमान परिपेक्ष्य में नवगीत रचनाओं के नये क्षेत्र बहुत ही विस्तार लिए हुए हैं और भविष्य में भी लेंगे, जो नवगीत की मिट्टी के घर की नींव को पक्कापन देंगे और दीवारों को लीपकर उनका सौंदर्यीकरण लगातार करते रहेंगे | नवगीत की मंजुलता के आंगन में बैठा हर पंछी सदैव पंख फड़फड़ाता और खुले में रहनेवाले मयूर की तरह शब्द-नर्तन करता ही रहता है, सदैव करेगा | रचनाकार के शब्द और शब्दिता कभी किसी मंजूषा में कैद नहीं रह सकते | रचनाकार की वाणी सदैव नीर-क्षीर विवेकी होती है | यदि यह संभव नहीं होता तो साहित्य की स्वर-धारा का विलय कभी का एक सन्नाटे में हो गया होता | साहित्यकार को सत्ता के पास रहकर भी उसके गुण-दोष को सदा जाज्वल्यमान करते रहना चाहिए | उसका निष्पक्ष होना बहुत आवश्यक है | गीत, नवगीत के सोपान तक आते-आते कई रूपों और प्रारूपों में साहित्य के पन्नों और समाज के जनमानस में उछलकूद करता रहा है, उपस्थित रहा है | गीत पहले गीत नहीं था | यह स्वयं एक संगीत था, संगीत का एक राग था ‘ध्रुवा’, ध्रुवपद’, ‘ध्रुपद’ | संगीत के इस ‘ध्रुपद गायन’ को ही गीत माना जाता था | ऐसा भारतीय शास्त्रों में कहा गया है | कहा तो यह तक जाता है कि इस ‘ध्रुपद’ के ध्रुवक की ध्रुवता ही इससे अलग होकर ‘पद’ बनी | ‘ध्रुपद’ में देवी और देवताओं की लीलाओं और राजा-महाराजाओं का यशगान ही गाया जाता रहा है | गीत ‘पद’ के रूप में भक्तिकाल में सिरमौर रहा है | समय के साथ प्रकृति और साहित्य में परिवर्तन अपनेआप होता रहता है और कुछ समय तक अदृश्य अवश्य रहता है | समय के साथ यह परिवर्तन समाज और साहित्य तक में होता है | ध्रुपद को कालान्तर में पद कहा जाने लगा | गीत का इन 8 चीजों से गहरा और मधुर संबंध है-“झपताल, ठुमरी, धमार, नाटक, पंजाबी भाषा, भरत, मृदंग और लोकगीत |” लोकगीत चाहे किसी भी बोली और भाषा का क्यों न हो? एक मधुर गीत है | सूरदास, मीरा के पद, कबीर की बानी और बाबा गोरखनाथ की सारंगी पर गाये जानेवाले योगियों के ‘ योगीरा भजन’ गीत ही तो रहे हैं | गीत के तीन प्रभाग हुआ करते थे | प्रारंभ उद्गाह से होता था, मध्य भाग को अंतरा कहा जाता था और अंतिम भाग को आभोग या भोग कहा जाता था | यह सब कुछ सांगीतिक रूप में कहा जाता था | बाद में गीत को और वैज्ञानिकता और प्रामाणिकता प्रदान कर ‘स्थायी’ और ‘अंतरा’ तक सीमित किया गया और अंतरों को भी एक निश्चित सीमा तक स्थान दिया गया | गीत की संज्ञा पहले चार भागों में ‘स्थायी’, ‘अंतरा’, ‘संचारी’ और ‘आभोग’ में बँटी हुई थी और इन्हीं नामों से पुकारी जाती थी | बचपन में जब लोकगीत की ‘रामायण मंडली’ में गाता था तो इन बातों और शब्दों की चर्चाएँ सदैव बड़े लोग जो इन चीजों की सूक्ष्मता और गूढ़ता से परिचित थे, करते रहते थे | कुछ विद्वानों का मत है कि गीत मुक्तक से बना है, बात कुछ भी हो, यह एक शोध का विषय है | देखा यह गया है कि ‘पद’ में जो पहली पंक्ति होती थी, पद के आगे की बात कहने के बाद उस पहली पंक्ति को सीधे-सीधे दोहरा दिया जाता था | ‘पद’ की दोहराई जानेवाली पहली पंक्ति को ‘स्थायी’ मान लिया जाए और ‘मुक्तक’ के मुक्तक वाले हिस्से को ‘अंतरा’ तो यह स्पष्ट हो जाता है कि गीत का संविधान जब बनाया गया होगा या गीत को एक व्याकरण देने का प्रयास हुआ होगा तो ‘पद’ की पहली पंक्ति की तरह की पंक्ति को ‘स्थायी’ और ‘मुक्तक’ के रूप में प्रयोग किए जाने वाले अंश को ‘अंतरा’ कहा गया होगा | ‘पद’ और ‘मुक्तक’ का योगदान गीत में एक दूसरे के पूरक के रूप में हुआ होगा और अपनी बात को एक बिंदु पर केन्द्रित रखने के लिए अंतरे की उस पंक्ति को जो अंतरे और स्थायी को जोड़ती है, को स्थायी से मेल खाती तुक और संवेदना से सिक्त किया गया होगा ताकि कहन में बदलाव और भटकाव न हो | जहाँ तक गीत का प्रश्न है ‘अंतरे’ की पूरक पंक्तियों को ‘स्थायी’ से जोड़ा जाना कहन और गेयता में एकरूपता और तारतम्यता लाने के लिए भी आवश्यक है | यह देखा भी गया है कि ‘अंतरों’ के बाद ‘स्थायी’ को दोहराने से कथन में निरन्तरता को आवश्यक सामंजस्यपूर्ण समर्थन मिल जाता है और यह समर्थनकारिता का गुण गीत को बहुत ही कर्णप्रिय, चक्षुप्रिय और अधिक प्रभावशाली बना देता है | कर्णप्रिय गीत मंच पर और चक्षुप्रिय गीत पुस्तक के पन्नों पर रहने के अभ्यस्त होते हैं | गीत जितना मंच पर असर पहुँचाने वाला है, उतना ही पुस्तक के पन्नों में भी है | यह एक अलग बात है कि आजकल मंचीय गीतों की गुणवत्ता दयनीय स्थिति में है | यह कहने में संकोच का कोई स्थान नहीं बचता कि गीत को एक वैज्ञानिक रूप देने के लिए साहित्य के महारथियों, कर्णधारों ने अनेक बातों को ध्यान में रखते हुए ‘पद’ और ‘मुक्तक’ के गुणात्मक संदेशों को संज्ञान में अवश्य ही लिया होगा |
हिंदी साहित्य में गीत
ने बदलते समय के साथ अपने कई पड़ाव बदले हैं | गीत मानव-मुख से कब और किन परिस्थितियों में निकला, एक वैज्ञानिक और ऐतिहासिक खोज का विषय है | रोना भी एक गीत माना
गया है और इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि गीत उसी दिन पैदा हुआ जिस दिन मानवता
ने धरती पर जन्म लिया, साँस ली | गीत को कई नामों से पुकारा गया और उसे हिंदी साहित्य ने स्वीकार किया | आजकल जो गीत की
रूपरेखा है, वह नवगीत के
रूप में है | गीत की
पारंपरिकता का चलन कभी समाप्त नहीं होगा क्योंकि गीत के बीज वहीं से (पारंपरिकता)
से ही अंकुरित होते हैं | ‘गीत’ में ‘नव’ जुड़ जाने से ‘नवगीत’ बना है | कहने का तात्पर्य कि
नवगीत, गीत ही है किन्तु उसकी कुछ अलग मान्यतायें हैं, जिसके कारण वह गीत होकर भी गीत नहीं है | प्रत्येक गेय विधा गीत नहीं हो सकती क्योंकि मुक्तक, दोहे, छंद आदि अपने विधान
से बँधे हैं जो गेय हैं, फिर भी उन्हें गीत नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके मात्रिक
और वर्णिक विधान अलग हैं और गीत के अपने अलग विधान और संविधान हैं | नवगीत की पहली
प्रतिबद्धता गीत होना तो है ही | यदि नवगीत में गेयता का अभाव है तो उसे नवगीत की
संज्ञा से सुशोभित नहीं किया जा सकता | एक बात यह आजकल किसी गोष्ठी, आकाशवाणी के
कार्यक्रमों या सम्मेलन में बल देकर कहा जाता है कि इसे गाइए नहीं, पढ़िए | गीत को
पढ़े जाने से उसकी संप्रेषणीयता गाने से कुछ अधिक बढ़ तो जाती है किन्तु गीत का गेय
होना भी प्रथम आवश्यकता है | गीत गाने से श्रोता ध्वनि, लय और सुर के कंठजाल में
अपनी श्रवण क्षमता को बाँट लेता है, सुनने की प्रक्रियाओं से थोड़ा भटक जाता है |
यह तो अनभुव किया ही जाता है और सत्यता के अति निकट भी है | फिर भी गीत और नवगीत
में गेयता होना अनिवार्य है | कोई गीत जब साज के साथ गाया जाता है तो उसकी मधुरता
सांगीतिक होकर उसकी कर्णप्रियता बढ़ाती ही है, वह लोकप्रिय भी हो जाता है |
गीत, नवगीत और नई कविता में
से कहा जाए तो गीत सबसे पुरानी विधा है | नवगीत, गीत से उत्पन्न हुआ न कि नई कविता
से | पहले गद्य रूप में लयात्मक कविता कहाँ थी ? गद्य में लयात्मकता की संगति को
ही तो नई कविता कहा गया है | गद्य में लय की प्रविष्टि के बाद उत्पन्न रचना को ‘नई
कविता’ कहा गया | गद्य में भी कविता की ही तरह से एक अलग लय होती है जो उसे पठनीय
और अर्थपूर्ण बनाती है | यह अधिकार के साथ कहा जा सकता है कि नई कविता, गीत से
अवतरित हुई क्योंकि पहले कहानी आदि कही और सुनी तो जाती थीं किन्तु नई कविता का
कहीं नाम और चिह्न तक नहीं था | कहा यह
जाता है कि नई कविता का जन्मदाता पाश्चात्य साहित्य है | हिंदी के पाश्चात्यीकरण
से नई कविता का जन्म हुआ | लोग कहते हैं | किन्तु कोई यह क्यों नहीं कहता कि नई
कविता का जन्म संस्कृत के श्लोक से हुआ जो एक कठोर सत्य है | यह कहने का आधार यह
है कि संस्कृत के श्लोक बिना तुकबंदी के होते हैं और लयात्मकता इतनी कि नई कविता
उसकी बराबरी कहीं भी नहीं कर सकती | नई कविता पाश्चात्यीकरण से अपने को इसलिए
जोड़ना चाहती है ताकि अपने को विकासिता से जोड़ सके | कोई बात एक दिन में नहीं सामने
आ जाती, समय लगता है, बीज बोने, देखभाल करने से अंकुरित होने तक की प्रक्रियाओं से
गुजरने में | कहा जाए तो विद्वानों का मत है कि गीत से नवगीत का अंकुरण उन्नीसवीं
सदी के दूसरे दशक से आरंभ हो गया था और छठे दशक तक गमले में जमा नवगीत का वह पौधा
और बड़ा होता गया और जमीन पर एक पीपल की तरह 1958 तक फैल गया और वह अब वटवृक्ष का स्वरूप ले लिया है | यह
भारतेंदु कालीन कुछ साहित्यिक गीतों को पढ़कर जाना और समझा जा सकता है | भारतेंदु
हरिश्चन्द्र, प्रेमघन और श्रीधर पाठक के गीतों में नवगीत की झलक और सुगबुगाहट
मिलती है | महाप्राण निराला जो लीक से हटकर चलने का साहस रखते थे, जन्मदाता हैं,
नवगीत के | जब डा. शम्भूनाथ सिंह और डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह अपने नवगीत के
कारण, प्रशंसा की पुलई पर थे, नवगीत आसमान पर इंद्रधनुषी छटा बिखेर चुका था |
हिंदी साहित्य के नए और पुराने सभी नवगीतकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से नवगीत
की जड़ में अपनी अनुभूति की मिट्टी डालने का सतत प्रयास किया है | सीखना एक अनवरत
प्रक्रिया है और यह किसी भी साहित्यकार को समकालीन और स्पर्धा दोनों में बनाए रखने
का प्रयत्न करती है | यह कहना कि नवगीत नई कविता से अवतरित हुआ स्वीकार्य न करने
के योग्य है | हाँ ! नई कविता के प्रचलन में आने के बाद गीत को एक नई दिशा देने का
विचार अवश्य आया और प्रयास तीव्रता के साथ आगे आए | नई कविता और नवगीत में स्पर्धा
बढ़ी | नई कविता पाश्चात्य साहित्य से प्रभावित तो रही है, यह उसकी कुछ नया करने का
उत्साह और कमजोरी कह सकते हैं | यह निजी विचार हो सकता है किंतु सत्यता के निकट है
| गीतकार और नवगीतकार प्रचारवाद में पहले बहुत कम विश्वास रखते थे किन्तु समय के
साथ इसमें काफी बदलाव आ गया है | जिसके पास गीत और नवगीत है वह अपने बोझ और बूझ से
लदा है और उसके पास इतना समय नहीं है कि वह अपना ध्वनिग्राहक उठाकर सुबह से शाम
तक, अपने प्रचार में फेसबुक के पटल पर जमा रहे | न खाने की चिंता न आराम करने की |
सभी साहित्यकारों के मुँह पर साहित्यिक बढ़त का मास्क लगा होता है और सभी एक दूसरे
से ऊपर बढ़ने की आशा में लगे रहते हैं और यह एक अच्छा गुण कहा जा सकता है किंतु
किसी को नीचा दिखाने के फेर में पड़े रहना ठीक नहीं है | परिस्थितियों के अनुसार
परिस्पर्धा में बने रहने में कोई बुराई नहीं है | किसी का विरोध के लिए विरोध करना
ठीक नहीं, मत विभिन्नताओं का स्वागत होना चाहिए | यह सोचना अच्छा है कि जब नवगीत
है तो हम सब नवगीतकार हैं, अन्यथा नहीं | नवगीत को साहित्यिक पढ़े-लिखे लोगो का एक
अखाड़ा और अपने वर्चश्व का झंडा बुलंद करनेवालों
से बचना और बचाना होगा | कौन कितना बड़ा नवगीतकार है, इसका निर्णय-प्रभार
वर्तमान पर नहीं, भविष्य की निष्पक्ष समालोचनाओं और आलोचनाओं पर छोड़ना होगा |
“नवगीत, गीत की हँड़िया में
नई समकालीन कविता की आँच पर नये यथार्थवादी प्रयोग, शिल्प, भाषा, प्रतीक, शैली, रूपक, बिंब, कहन, कल्पना, मुहावरा और सामाजिक सरोकार के दूध को
संक्षिप्तता, मार्मिकता, सहजता, सरलता, बेधक शक्ति का समन्वय
एवं सामयिकता की लकड़ी को शब्द की दियासलाई, संवेदना की तीली, अनुभूति की चिनगारी से जलाकर और अच्छी तरह औटकर जमाये गये सजाव
से लयात्मकता की मथानी से मथकर निकाला गया नवनीत है |”
यह कथन शब्दों के भार से
थोड़ा बोझिल तो हो गया है किन्तु नवगीत के गुणात्मक अवस्थाओं को एकत्र करने के
सहायकत्व के अनुभव को कम से कम थोड़ा-बहुत समर्थन तो किया ही है किन्तु कुछ मित्रो
ने फेसबुक पर इसका जमकर विरोध किया | विरोध, विरोध के लिए हो तो शुभ नहीं माना
जाना चाहिए | सुझावात्मक विरोध हो तो स्वागत करना अच्छा लगता है | उपरोक्त कथन पर
फेसबुक पर बहुत हो-हल्ला मचा, जबकि यह कोई दावा नहीं किया गया था कि यह नवगीत की
परिभाषा है | यह मन में उपजा एक सहज सरल उद्गार (नवगीत के लिए ) तब भी था और अब भी
है | मन में उठते विचारों पर कोड़ा नहीं चलाया जा सकता | बाँध बनाकर रोका नहीं जा
सकता, मन में उठी अनुभूतियों के प्रवाह को | समुद्र की लहरें समुद्र के किनारों को
भी धक्का देकर आगे निकलने का प्रयास करती हैं और निकल जाती हैं, किसी भीड़ में जाकर
किसी से धक्कामुक्की नहीं करतीं, टकराती हैं अवश्य | अनुभूतियों का ज्वार-भाटा
प्रत्येक मानव मन में जब उठता है तो कोई उसे कलमबद्ध कर लेता है और कोई नहीं | यह
अंतर होता है एक आम आदमी और रचनाकार में | रचनाकार के विचार की अनुभूतियाँ (गीत, नवगीत, नई कविता या कोई साहित्यिक विधा)
मन में घिकुरी मारकर नहीं बैठतीं और वे तब तक चैन से नहीं बैठती हैं, जब तक कागज
के पन्नों को, स्याही में अक्षर भरकर, शब्द के मोतीचूर बनाकर उन्हें रंग नहीं देती
| कई मित्रो के कथ्य मन में उछल तो रहे हैं किंतु यहाँ नवगीतकार स्मृतिशेष कुमार
रवीन्द्र जी की सुझावात्मक टिप्पणी की विवेचनात्मक चर्चा करना उचित और आवश्यक माना
जा सकता है- “नवगीत के लिए कहा गया यह कथन कुछ सीमा तक ठीक तो है किंतु
अतिशयोक्तिपूर्ण है |” एक मित्र ने कहा कि ‘जब नवनीत बन ही गया है तो घी भी निकाल
लेना चाहिए था |” विचार, विचार है | स्वागत है | आदरणीय कीर्तिशेष कुमार रवीन्द्र जी की बात नवगीत के बारे
में कम शब्दों में कुछ अधिक बात कहने को
उत्प्रेरित करती रही और एक दिन एक वाक्य अनुभूति की रश्मि के श्वेत पटल पर “नवगीत,
नई कविता का महानगर और गीत का छोटा सा गाँव है |” मन के आकाश मंडल पर उभरा | इस
पंक्ति पर कई मित्रो के विचार बड़े ही उत्साहित करनेवाले रहे, जब फेसबुक पर रखा गया
| नवगीतकार आदरणीया शांति सुमन जी ने अपने शांतिपूर्ण कथन में कहा है “यह टिप्पणी
मोहक है |” और यह कहना मन को एक संबल प्रदान करता है | सभी को अपने विचार प्रकट
करने का पूरा अधिकार है किंतु परिहास करने का नहीं | सहमत होना और न होना अलग बात
है | अपने विचार अलग रखना सबकी मानसिक स्वतन्त्रता के अंतर्गत आता है और उससे कुछ
और नया सीखने और कहने का उत्साह मिलता है | प्रशंसा एक ऐसा प्रसाद है जो मीठा होता
है और समालोचना नमकीन, तीखी और खट्टी भी |
नवगीत लेखन भी कम से कम मेरी
समझ से छह वर्गों में बँटा हुआ है | यह नवगीत की शैली का वर्गीकरण है किसी नवगीतकार का नहीं | एक वर्ग तो वह है जो
नवगीत को लयखंड की अपेक्षा अर्थखंड में लिखना पसंद करता है और ऐसा लगता है कि उनका
नवगीत छंदमुक्त (छन्दमुक्त का आशय है छंद के त्याग से यानीं कि ऐसी कविता जिसमें
भाव की अभिव्यक्ति के लिए कोई लय तक न निर्धारित की जाए) है किन्तु वे अपने नवगीत
को पूरी तरह से लय की सीमा में रखते हैं | उनके नवगीत गेय तो नहीं होते किन्तु पठनीयता में लय के तारतम्य को बनाये रखने
में सफल रहते हैं | उनके नवगीत संस्कृत के कुछ कठिन शब्दों से सँवरे होते हैं, जो आम जनता में
प्रचलित नहीं होते किन्तु भाव का संवर्द्धन करने में पूरी तरह सक्षम होते हैं | दूसरे वर्ग के नवगीतकार
वे हैं जो नवगीत को छंद और लय से जोड़कर खड़ा करते हैं | अपने नवगीत के ‘स्थायी’ का एक अपना अलग नया रूप तय करते हैं और अंतरे को एक छंद में बाँधकर रखते हैं
और लिखते हैं | ‘अंतरे’ की अंतिम
पंक्ति को जो ‘अंतरे’ को ‘स्थायी’ से जोड़ने का काम करती
है, ‘स्थायी’ की पहली पंक्ति या
दूसरी पंक्ति के समान उत्तरदायित्व की रखते हैं, जो गेयता के लिये आवश्यक होती है और नवगीत
के कथ्य को ‘अंतरे’ और ‘स्थायी’ से जोड़ देती है | इस श्रेणी के
नवगीतकार नवगीत में मात्रा विधान के अनुशासन के सम्मान में खड़े होते हैं और नवगीत
में लय और गेयता की एक रूपता को प्रारंभ से अंत तक निर्वाहन करने की कला में
प्रवीण होते हैं | तीसरे वर्ग के नवगीतकार दूसरे वर्ग के नवगीतकारों के बिलकुल साथ खड़े होते हैं
किन्तु कहीं-कहीं छंद
विधान और मात्रा विधान से थोड़ा अलग हटकर नवगीत को रचते हैं और वे ऐसा अपनी संवेदना
को और सशक्त करने के लिए करते हैं | उनकी लय की संरचना अंतरों के पनघट से अपने स्वर के कंठ को बस सटाए रखती है, ताकि नवगीत अपनी लय और
तथ्य से न भटके | चौथे वर्ग के नवगीतकार वे हैं जो कम शब्दों में अधिक बात कह तो देते हैं
किन्तु नवगीत को लय में रखकर भी नवगीत की लय में समानता नहीं रख पाते और नवगीत को
मात्रा विधान में कुछ छूट देने के पक्षधर होते हैं | लय की धुन और स्वर स्थिर नहीं रख पाते, सुर शब्द संयोजन के साथ लय
की पगडण्डी पर इधर-उधर मुड़ता और दिशा बदलता रहता है, किन्तु नवगीत अपने लक्ष्य पर खरे होते हैं, मारक होते हैं | पाँचवें प्रकार के
नवगीतकार वे हैं जो मुक्तछंद (जब किसी एक छंद के अनुशासन का अनुपालन न किया जाए और
कविता में लगातार उसके अंदर ही एक लय को जीवित रखा जाए) का समर्थन करते हैं और वे यह मानते हैं कि
पंक्तियाँ चाहे जितनी बड़ी हों, उनमें भावुकता और आंतरिक लय हो तो वह नवगीत है, भले उसे पढ़ने में गद्यात्मकता का ही आभास
क्यों न हो | ऐसे नवगीतकार
बहुधा विचारपरकता को अपना आधार बनाते हैं | छठवीं श्रेणी के नवगीतकार वे हैं जो अपने नवगीतों में लय और
कथ्य को बाँधकर तो रखते हैं और हिंदी से इतर शब्दों का प्रयोग करने में नहीं
हिचकते | बोली और
प्रांतीय शब्द तो नवगीत को बल प्रदान करते हैं और उनमें मिठास का संचार होता है
किन्तु अँगरेजी और उर्दू के शब्द भाषा शैली की लौनता को सरसता से दूर ले जाते हैं | नवगीत की शैली का
श्रेणीबद्ध होना स्वाभाविक है | यदि ऐसा न हो तो नवगीतकारों की शैली एक ही रहेगी और उनमें अंतर करना बहुत ही
दुष्कर कार्य हो जाएगा | भाव बिंब आदि अलग तो हो सकते हैं किन्तु लय की गेयता में एकरूपता की आशंकाओं
का निवारण होना कठिन कार्य हो जाएगा | यह क्रम अपनी बात कहने भर के लिए है, नवगीतकारों की वरिष्ठता के दृष्टिकोण से
न देखा जाए |
नवगीत तो नवगीत है | वह गीत भी है | अब एक
और प्रश्न आजकल चर्चा में यह तैर रहा है कि कोई नवगीतकार अपने को गीतकार क्यों
नहीं कहता ? गीतकार लिखने में लज्जा अनुभव करता है | बात लज्जा की नहीं, व्यवस्था
की है | वह व्यवस्था है गीत और नवगीत के अपने संविधान की | गीत में पारंपरिकता है
और अंतरों पर अंकुश नहीं जबकि नवगीत में यह सब नहीं है | बात स्पष्ट है कि जब कोई
रचनाकार नवगीत लिखता है तो वह नवगीतकार लिख सकता है क्योंकि वह नवगीत की डोर से
बँधा है | यह जानने के लिए गीत और नवगीत के अंतर को आधार बनाया जाना चाहिए |
नवगीतकार यदि अपने को गीतकार लिखता है तो यह उसके ऊपर निर्भर है और वह दुविधा में
है कि उसके गीत नवगीत हैं भी या नहीं | एक बात यह भी बहुत चल रही है कि लोग अपने
नाम से पहले कवि, महाकवि, कवि शिरोमणि लिख रहे हैं और उन्हें कविता का क.ख.ग भी
पता नहीं है किन्तु कवि लिखकर वे लोग अपने और अपने नाम को हास्य का उपकरण बना रहे
हैं और हास्यास्पद भी | नवगीत को आजकल कई नाम देने की एक होड़ सी लगी हुई है |
‘गीतांगिनी’ में १९५८ में ‘नवगीत’ शब्द का
अवतरण हुआ और यह नाम उस समय सर्वप्रियता के साथ-साथ लोकप्रिय भी था और अब भी है |
‘नये गीत’ के साथ ‘नवगीत’ भी हवा में उछल
रहा था और इसे डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ‘गीतांगिनी’ में पहली बार सजाया |
नवगीत सहजता के प्रति उन्मुखता, शुभात्म्क बोधकता, कथ्य में संश्लिष्टता की उपस्थिति,
मन:स्थिति की प्रधानता, ध्वनि प्रधानता,
बिंब-कथ्य की संकोचनता, लय और गति से जुड़ा स्वर और तात्विकता से भरपूर एक नया
नामकरण है | यह बात हिंदी के भाषाविदों ने कही है | नवगीत, सहजगीत, अगीत,
समकालीनगीत और पता नहीं क्या-क्या गीत, नवगीत को कहा जा रहा है जो राह भटकाने के
सिवा और कुछ नहीं है | नवगीत शब्द की व्याख्या और विवेचना पर बहुत अधिक बातचीत और
व्याख्यान हो चुके हैं तो और नया नाम देना हास्यास्पद और निरर्थक है | यह सब वे
लोग कर धर रहे हैं जो नवगीत विधा में असफल हैं और अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए
अनेक नाम का ‘नामकरण संस्कार’ कर रहे हैं और एक नई विधा का प्रर्वतक बनना चाहते
हैं | इन नामकरण संस्कारों से नवगीत का कोई अहित नहीं होने वाला, अहित उनका है जो
नवगीत की राह में रोड़े बिछा रहे हैं और यह भूल रहे हैं कि नवगीत के बुल्डोजर
कंकड़ों-पत्थरों को कुचलकर नवगीत की इस सड़क पर उसकी परिभाषा के अनुरूप सोंधी मिट्टी
डालकर उसको सहज और सरल बनाते रहेंगे | यदि नवगीत में कोई नई चीज उतर रही है तो
पहले उसकी नवता की व्याख्या भी की जानी चाहिए | नवगीत ही की व्याख्या और वाख्यान
पर नया नामकरण करना ठीक उसी प्रकार है जैसे सत्यनारायण की कथा में त्रिलोकीनाथ की
कथा का बीच-बीच में प्रसंग छेड़ दिया और कथा का पाठ किया जाए | नवगीत की दीवार पर
एक नया विज्ञापन चिपका कर उसे फीका किया जाना एक धोखा है और छल की सीमा में बैठने
के साथ ही न क्षमा किया जाने वाला एक अपराध और अपराग है और उसी की श्रेणी में
श्रेणीबद्ध किए जाने योग्य है | परिवर्तन होना एक स्वाभाविकता है किंतु वह दिखाई
भी तो दे | अभी एक मित्र ने कुछ दिनों पहले नवगीत के लिए ‘अभिनव गीत’ की बात की थी
| नवगीत केवल नवगीत है और उसको और नाम दिया जाना ठीक नहीं और न इसका समर्थन कभी
किया जा सकता है | नाम के पीछे वे लोग दौड़ रहे हैं जो केवल अपने नाम की भगदड़ की
भागदौड़ की दौड़धूप में सम्मिलित हैं | वे अपने को उस नई विधा का प्रवर्तक प्रस्तुत
करना चाहते हैं और ये वे लोग हैं जो गीत और नवगीत दोनों स्थानों पर असफल सिद्ध हुए
हैं और गीत और कविता के लिए गिद्ध बने और हुए पड़े हैं | गिद्ध को झपट्टा मारने
वाले पंछी के अर्थ में लिया जाना चाहिए | नवगीत की तरह इसकी एक अलग विधा भी समय के
साथ अपने नए रूप में आज नहीं तो कल अवश्य होगी और इसे झुठलाया नहीं कहा जा सकता
किंतु पहले वह वातावरण तो सामने हो, जो
अभी कहीं नहीं दिखाई दे रहा | हिंदी में बढ़ते अँगरेजी शब्दों के प्रभाव से हिंदी
का रूप जब हिन्दीलोक में नहीं रहेगा तब इसकी माँग स्वयं आकर भाषा वैज्ञानिकों के
सामने खड़ी हो सकती है या कविता मानव-कविता न होकर आंकिक (डिजिटल) कविता हो और उस
समय कविता और गीत संगणक (कम्पूटर) लिखने
लगें | नया नाम उभरने की प्रबल संभावना है और संभावनाओं में सब कुछ निहित है | यह
एक परिकल्पना है और परिकल्पनाओं में एक सत्य छिपा रहता है जैसे गणित के प्रश्न को
हल करने के लिए कहा जाता है कि माना कि इस पुस्तक का मूल्य सौ रुपए हैं और हल करने
पर उत्तर में वास्तविक मूल्य कुछ और निकलता है | यह काल्पनिकता मान्य होनी चाहिए |
आजकल नई उम्र के नवगीतकार अँगरेजी के शब्दों का प्रयोग अपने नवगीत में बिना
हिचकिचाहट के कर रहे हैं और उनका यह प्रयोग नवगीत को एक अलग पंक्ति में लाकर खड़ा
कर रहा है और लगता है नवगीत की एक नई भाषा सामने आ रही है जो हिंदीपन से अधिक
अँगरेजीपन से जुड़ी है | देवनागरी में बस लिखी जा रही है | यह अँगरेजी के शब्दों का
हिंदी में घुसपैठ है और इन शब्दों को जो हिंदी में बहुत प्रयोग किए जाने लगे हैं
हिंदी के शब्दकोषों में सम्मान दे देना उचित होगा ताकि वे घुसपैठियों की अपकीर्ति
से शब्द बच सकें | यह काम भाषाविदों को करना होगा | उन नवगीतों को जो, अँगरेजी के
शब्दों से सुशोभित हैं, को हिंदी के नवगीत कहना तभी उचित होगा | नहीं तो ये एक नई
भाषा ही गढ़ रहे हैं जैसे कि कुछ दिनों पहले ‘हिंगलिश’ या ‘हिंग्रेजी’ शब्द इस नई
भाषा के लिए प्रयुक्त हो चुके हैं और हवा में तैर रहे हैं | ये शब्द नवगीत को एक नई भाषा, नई शैली और शिल्प की ओर संकेत तो
कर ही रहे हैं | इन्हें अस्वीकार नहीं किया जा सकता है | हिंदी को तब तक किसी डर
और आशंकाओं से मुक्त समझा जाना चाहिए, जब तक कि देवनागरी पर संकट न खड़ा हो |
मित्रो ! “नवगीत, नई कविता का एक महानगर और गीत
का छोटा सा गाँव है |” यह वाक्य नवगीत की
कोई परिभाषा नहीं है, मन में उपजी एक संवेदना का साधारण सा उद्गार है | भ्रम न
पाला जाए | विगत वर्ष २०२० बहुत ही डरावना और भयानकता से ओतप्रोत रहा है | ‘कोरोना
काल’ का एकांतवास कुछ लोगों की लेखनी के लिए वरदानों से भरा हो सकता है किंतु
विश्व में इस महामारी का प्रलय और प्रलयंकारी रूप किसी की खुली आँखों से छिपा हुआ
नहीं है | पूरे विश्व का इस आघात से निपटना किसी महायुद्ध के होने और उससे लड़ने के
समान है | ‘खेत पके होंगे गेहूँ के’ की रचनाओं में कोरोना काल के नवगीतों को भी
प्रचुरता में स्थान मिला है और यह स्वाभाविकता के अनुरूप है | साहित्य समाज का
दर्पण है और वह बहुत सीमा तक दर्पणीकृत हुआ है | कश्मीर में धारा ३७० समाप्त होने
के बाद पूरे देश में एक विशेष वर्ग और राजनीतिक सोच के विरोध को भी समाहित किया
गया है, जो सप्रयास नहीं अनायस है | शाहिन बाग की झलक भी है | इसी बीच हिंदी ने अपने
प्रिय गीतकार और नवगीतकार जनलोकवासी किशन सरोज को दिनांक ०८.०१.२०२० को स्वर्गवासी
कर दिया, उनकी स्मृति में एक श्रद्धांजलि नवगीत भी अपना स्थान बनाने में सफल हुआ
है | इस संग्रह में दिनांक 06.11.2019 से 08.06.2020 तक की 73 उद्गीत रचनाओं
को सादर स्थान मिला है | जब से हिंदी साहित्य का सानिध्य मिला है फेसबुक के अनेक
मित्र और अन्य मार्गदर्शक मिले हैं जिनका स्नेहिल आशीर्वाद समय-समय पर मिलता रहा है
और उनमें से कुछ हैं, डा. कीर्तिशेष हरिराज सिंह ‘नूर’, किशन स्वरूप सुप्रसिद्ध
गजलकार मेरठ, डा. वेदप्रकाश अमिताभ, डा. पशुपतिनाथ उपाध्याय, डा. कुंदनलाल उप्रेती
अलीगढ़, डा. मधुकर अष्ठाना, डा. दामोदर दत्त दीक्षित लखनऊ, डा. प्रेम जनमेजय, डा.
राधेश्याम बन्धु नई दिल्ली, डा. ओमप्रकाश सिंह लालगंज रायबरेली, डा. माहेश्वर
तिवारी, योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ मुरादाबाद, डा.राधेश्याम शुक्ल हिसार, मुकुट
सक्सेना जयपुर, डा. अश्वघोष देहरादून आदि | एक बहुत बड़ी सूची बन सकती है किंतु समय
और स्थान की सीमाओं का भी बंधन है | ‘खेत पके होंगे गेहूँ के’ को आदरणीय मुकुट
सक्सेना और उनकी स्वर्गनिवासिनी पत्नी प्रेम सक्सेना जी को समर्पित किया गया है |
उनका जो मार्गदर्शन मुझे मिला है उसे भुलाया नहीं जा सकता | इस संग्रह की भूमिका
में डा. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ सूरत गुजरात, डा. भुवनेश्वर दुबे मांडा
प्रयागराज और डा. नितिन सेठी बरेली उत्तर प्रदेश उपस्थित हैं और इन त्रिदेवों का
आभार कि अपने अमूल्य समय में से बहुत कुछ समय निकाल कर ‘खेत पके होंगे गेहूँ के’
को सौन्दर्य और सुगंध देने का योगदान किया है | उनका आभार किन शब्दों में किया जाए
शब्द नहीं मिल पा रहे हैं और लेखनी मौन है | अब तक अपने किसी भी संग्रह का नाम
स्वयं मैंने नहीं रखेऔर इसका सहयोग मित्रो से मिलता रहा है | ‘खेत पके होंगे गेहूँ
के’ का नामकरण आदरणीय डा. भुवनेश्वर दुबे जी ने की है और उनका आभार और स्वागत है,
इस पुनीत कार्य में सहयोग देने के लिए | मेरी पत्नी श्रीमती आभारानी सिंह का आभार
कि कई वाक्य जो उनके श्रीमुख से निकले रचना के ‘स्थायी’ बनकर नवगीत को स्थायीत्व
प्रदान किए | अंत में अपने साहित्यिक गुरु कीर्तिशेष डा. कमल सिंह अलीगढ़ जिन्होंने
यह सिद्ध किया है कि ‘बाबा गोरखनाथ ही हिंदी के प्रथम कवि हैं’ को नमन करते हुए यह
साहित्यिक धरोहर आप और सुधी पाठकों के कर
कमलों में रख रहा हूँ | कितना सफल हुआ हूँ नवगीत की नींव में कुछ ईंट रखने में, यह
समय निर्धारित करेगा | २१,१७४ शब्दों के साथ
सादर नमस्कार |
शिवानन्द सिंह
‘सहयोगी’
‘शिवाभा’ ए-233 गंगानगर
मेरठ-250001, उ.प्र.
दूरभाष- 9412212255
अणु पता shivanandsahayogi@gmail.com
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