मुहल्ले के लोग
यहाँ क्या हुआ है?
इकट्ठे हुए हैं,
टंकी के नीचे,
मुहल्ले के लोग !
अन्तस तो कहता
पहुँच है पिया की,
खिड़की से झाँकी
लपट-मन-दिया की,
कभी हैं न देखे,
कहीं कुछ न कह दें,
बहुत टोकते हैं,
मुहल्ले के लोग !
बिजली तो चुप थी,
हवा कुछ न बोली,
आँखों ने धोए,
पलकों की खोली,
कागा न बोला, न
कुहुकी ही कोयल,
भाँपे हैं कैसे ?
मुहल्ले के लोग !
न कोई अपेक्षा,
नहीं सुगबुगाहट,
न भेजी पठौनी,
न कोई बुलाहट,
अगहन में आना,
बता तो रहे थे,
अटकल की दिल्ली,
मुहल्ले के लोग !
न भरते हुँकारी,
पीपल के पत्ते,
बिनती है रोटी,
कागज के गत्ते,
समझ के शहर में
नवागत सन्नाटा,
साधे हैं चुप्पी,
मुहल्ले के लोग !
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