चलो आज छत पर सोते हैं
गरमी से तन उबल रहा है,
पंखा कल से बंद पड़ा है,
चलो आज छत पर सोते हैं |
इस कमरे की चौहद्दी में,
सोने का आनन्द नहीं है,
आमदनी की कविताओं में,
धन का कोई छंद नहीं है,
प्रकृति हमारा घर-आँगन है,
ठंडे जल से घड़ा भरा है,
सब दुख का रोना रोते हैं
चलो आज छत पर सोते हैं |
अन्धकार की इन गलियों में,
जुगनू के कुछ दीप जलेंगे,
मन-समुद्र के गहरे जल में,
कुछ सपनों के द्वीप बसेंगे,
तारों का मनमोहक बीया,
बिखरे हैं जो आसमान में,
चुन-चुन धरती में बोते हैं,
चलो आज छत पर सोते हैं |
ठण्डी हवा मिलेगी जब-जब,
उससे मन की बात कहेंगे,
सुखद सृष्टि की यक्षपुरी में,
अनुभव सारी रात रहेंगे,
एक नई ऊर्जा से मिलकर,
नये बोध के नव प्रयोग से,
लोग प्रभावित कुछ होते हैं,
चलो आज छत पर सोते हैं |
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें