किसान और मजदूर जीवन के नि:सर्ग सौन्दर्य के गीत
नवगीत की दुनिया में शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ का जाना पहचाना नाम है। इनके नवगीतों की सबसे बड़ी पहचान है, जनजीवन से सहज जुड़ाव। इनकी आँखे वह सब देखती चलती हैं, प्राय : अभिजात्य वर्ग जिनकी अनदेखी करता आया है -
"सरकारी नल पर धोती है,
तन के
मैले कपड़े,
तंग शहर की लड़की।“
स्त्री जाति के प्रति कवि का संवेदनशील हृदय तब भावुक हो उठता है, जब वह देखता है कि एक गरीब स्त्री कितने स्तरों पर और किस तरह से सताई जाती है,
"जब देखो तब सीझ न पाता
मोटा
चावल खंडा,
निपट
गरीबी भाग लिखी है,
खाली
थैले पकड़े।"
अभाव में जीती इसी स्त्री और उसके संघर्ष के
गायक शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’
स्त्री के उस दर्द को समझ सके हैं और कह सके हैं कि-
"उभरे कई सवालों के सँग,
घेरे
में है जीती,
यह
अच्छा है, संकल्पक है,
जहर
नहीं है पीती,
आए हर
संकट से जूझी,
रह रह
झेले,तगड़े
जंग, शहर की लड़की।"
सरकारी तंत्र की
विफलताओं पर भी कवि की नजर है। वह देखता है कि किस तरह से सरकारी तंत्र जमीनी स्तर पर अन्य योजनाओं की
तरह ही बाढ़ के मामले में भीअसफल हुआ है। इस पर वह लिखता है-
"देशाटन पर निकल चुकी है,
नदियों
की धारा,
आँखों देखा हाल सुनाता,
मटिया
जल सारा।"
गीत साहित्य की
सबसे कोमल विधा है। यहाँ तर्क-वितर्क नहीं हैं। हृदय के सीधे सरल आवेग होते हैं। उद्वेलन
होते हैं। भीतर के बड़वानल से भाप बनकर उमड़े बादलों की उमड़-घुमड़ और बिजली की कौंध होती है और सबसे
बाद में होती है,
आँसुओं की बरसात । इन्हीं कारणों से बेईमानी मक्कारी से बनने वाले घरों के पक्के
हो जाने पर मन के भोलेपन का लोप गीतकार को बहुत अखरता है-
"पानी लड़ता है टंकी से
और
झगड़ती नवला छत से,
निर्माणों
की निर्मम गत है,
लुप्तप्राय
मन का भोलापन"
‘सहयोगी’ के नवगीतों में उनके भीतर का बड़वानल कभी-कभी केवल भाप लेकर ही नहीं, आग लेकर भी बाहर आ जाता है और
ऐसे अवसरों पर उनकी जनपक्षधरता अग्निमुखी होती हुई मिलती है। इसीलिए जब वह रोजगार दफ्तरों के बाहर दुनिया के सबसे नौजवान देश भारत की नवजवानी को व्यर्थ में
जाते देखता है तो भला उसे अग्निमुखी होने से कैसे रोका जा सकता है-
"रोजगार कार्यालय में हल,
कहाँ निकलता है ?
जमा हुआ हिमखंड भूख का,
कहाँ पिघलता है ? "
लोक प्रतिनिधियों
की वादाखिलाफी से समाज और राष्ट्र का जो नुकसान हुआ है। इससे भी कवि का मन कुछ कम
आहत नहीं है। वह कहता है -
"वादों के हर शब्द झिझकते,
भट्ठी
के हैं अब तो झाँवा,
जहाँ स्नेह का धान उपजता,
वहाँ
उगा अनचाहा सावाँ,
संबंधों
के जहाँ चचींडे,
लच्छे
टूट गए झाँखों के,
इतने
दिन कहाँ रहे |"
स्वागत सूख गए आँखों के
इतने
दिन कहाँ रहे?"
बिंबों की सर्जना में कवि बहुत सजग भी है और कुशल भी-
"अभी चुराकर एक चाँदनी,
कोई
चंद्रकिशोर गया है,
न्योता
करने धूप गई है,
उसे
लिवाने भोर गया है।"
किसान जीवन और उसके नि:सर्ग सौंदर्य को कवि अपनी कुशल कूची से रचता है-
"मटरों की पक गई छीमियाँ,
गेहूँ
है तैयार,
आदर्शों
की एक संहिता,
में
रहता है गाँव,
सतरंगी
सपनों में जीती,
उम्मीदों की छाँव |
पुरवाई
के आँचल-आँचल,
बँधी-बँधी है धूप |"
"माँगफूल सोने का, पहनी
सरसों की हर डाल,
तालाबों
में सैर कर रहे,
कमल-हंस-शैवाल
हरी दूब
की कोमल पिच पर.
गुगली
फेंक रहा है सावन,
सक्षमता
है,दम है, बालर में।"
पर्यावरण के साथ
खिलवाड़ पर कवि सजग होकर समाज को सचेत करना चाहता है-
"सूरज आया, धुंध ओढ़कर,
साफ
हवाएँ,गई हुई हैं
चौपाटी
पर खाने अंडे।
खेत
अलाव जलाकर जीता,
रेता
ठंडाई है पीता,
अँगुरी
मोजा पहन रही है,
ठिठुर
गया है पाँव।
पेड़ों के पत्तों पर सोई,
ओस
अनमनी ओढ़े लोई,
एक
टाँग पर खड़ी हुई है,
छतरी
ताने छाँव।"
मानवीय संबंधों की
सरलता और तरलता कवि सूखने नहीं देना चाहता। इसीलिए वह
कहता है-
"भावगम्य हो गए विशेषण
संबोधन बदले,
शब्दवेध हर गीत तत्व के
संशोधन
बदले,
ध्वनि वृंदावन का वंशीवट,
मंथन बहक गया |
तुम
आए क्या हुआ कि मन का,
आंगन चहक गया।"
आजादी की हीरक जयंती आने वाली है और हम उसी पायदान पर खड़े हैं जहाँ आज से 73 साल पहले खड़े थे। इसीलिए
युग गायक इस सच को भी गाने में संकोच नहीं करता और "विकास की चमक-दमक' उसे चिढ़ाती हुई-सी लगती है-
"जाने क्यों ऐसा लगता है,
छोटे
शहर बड़े विज्ञापन "
गरीब के जीवन की
सच्चाई तो 'रोज कमाना तवा चढ़ाना' है।इससे मुकर कर न देश सुखी रह सकता है और न समाज। इसलिए उन मजदूरों के लिए जमीनी योजनाएँ आनी चाहिए जिनसे 'सुबह शाम की रोटी का क्रम।' विखंडित न हो। मजदूर का जो जीवन श्रम के बलबूते चलता है फिर भी अनिश्चित है,वह सुनिश्चित हो सके। दुखियों के आँसू कम हो सकें । थम सकें-
"सुबह शाम की रोटी का क्रम।'
बंद
नहीं होता आँखों से,
आँसू
का छल-छल स्वर सरगम,
घर की
चौखट छोड़ चुके हैं,
छठी
घाट के अनुपम संगम,
चूल्हों-चौकों के अपनापन |"
नवगीतकार गरीबों की उस दुर्दशा का चित्रण कर रहा है जहाँ पर उसके लिए सुबह का भोजन है तो शाम का नहीं है।
शाम का है तो सुबह का नहीं है। एक बच्चे को दूध नहीं है तो दूसरे के लिए दवा नहीं
है। नवगीतकार गरीब के यहां खुशियाँ लाना चाहता
है।लेकिन वह उसे कर पाने में अपने को अक्षम पाता है तो और भी अधिक पीड़ा बोध के
साथ 'सुधी अक्षरो' शीर्षक गीत में अपने सहज सरल भावुक मन से
कुुछ इस तरह कुहक उठता है -
"सहज सरल तुम, बोधगम्य हो,
तुम
महान हो,
तुम
गरीब का दानादुनका-
तुम
मकान हो।
एक रहे
तो, भव्य एकता,
जनमत
की जय,
ध्वनिमत
की झनकार बनेगी,
सुधी
अक्षरो !
तनिक सजग,
चैतन्य
रहो तुम,
शब्दों
की सरकार बनेगी।"
यहाँ पर गीतकार पूर्णत: आशावादी दृष्टि से इस तरह आश्वस्त है कि वह जनजीवन को संबोधित करते हुए विश्वास दिलाता है कि एक न एक दिन सच्चे स्वर
की विजय और जो देश और समाज को ठग रहे हैं, उनकी पराजय होगी-
"उगता सूरज आ जाता है,
बाहर
की खिड़की के शीशे में,
घर की
छोटी बालकनी तक,
सिगरेटों
की आगजनी तक।"
कवि की चिंता का विषय
प्रदूषण भी है। वह मनुष्य को सुखी बनाने के सारे टूल्स इस्तेमाल करना चाहता है
ताकि अपने सर्वनाश से पहले मानवता की जड़ में समा रही दीमक का नाश करके मनुष्यता को
बचाया जा सके-
"खेल रहा बौने पेड़ों से,
सार्वजनिक
हर उपवन,
हरियाली
की जड़ में दीमक,
बढ़ा
रही है उलझन,
हवा प्रदूषित धवल धरा पर,
रह रह
गोली दाग रही है।
बढ़ते
शहर सिमटते कसबे,
खेती
डर कर भाग रही है।"
कोई रचनाकार अपने सरोकारों से छोटा या बड़ा
होता है। जो जितना लोक जीवन के निकट होता जाएगा वह
उतना बड़ा होता जाएगा।
नवगीतों की
अन्तर्वस्तु में अगर छायावाद का मार्दव, प्रगतिवादी चेतना का
तेवर, प्रयोगवाद के
नवोन्मेषी शैल्पिक प्रयोग और नई कविता का अल्हड़पन न हो तो उसे पारंपरिक गीत से
अलगाना मुश्किल हो जाएगा। इसी तरह इसकी काव्यभाषा में भी उपमानों से लेकर बिंब, प्रतीक और रूपक विधान
तक छायावाद से पीछे नहीं जाते, जबकि पारंपरिक गीत के उत्स सूर और मीरा के पदों में
भीआसानी से खोजे जा सकते हैं। ये तार इतने पीछे तक भी ले जाए जा सकते हैं कि
विद्यापति व जयदेव तक भी आसानी से पहुँच जाएँ। लेकिन नवगीतों की काव्य भाषा में
पारंपरिक उपमान फिट नहीं बैठते। महाकवि प्रसाद की तरह यहाँ भी स्थूल के लिए
सूक्ष्म उपमान 'पारा सिकुड़ गया सर्दी में'
मिल सकते हैं।
‘पारा सिकुड़ गया सरदी में’
और ‘सूरज भागा गाँव’ ‘सहयोगी’ के सचल बिंब अपनी गति के सापेक्ष हमें अपनी मोहकता में बाँधे हुए खींचते चले जाते हैं। किरणों का मानवीकरण ही
नहीं अपितु उनका संकोच और संताप भी इनके यहाँ हैं-
“किरणें धुंधों के चंगुल में,
पड़ी
हुई हैं कैद।“
इनकी धूप शैतान भी है और चंचल भी। लेकिन उसकी उपयोगिता असंदिग्ध है-
"धूप लगाती है इंजेक्शन
दवा
लिख रहा वैद।"
इतना ही नहीं एक से एक दृश्यों वाली मनमोहक (मानवीकरण की) झड़ी-सी लगी हुई है-
"एक टाँग पर खड़ी हुई
है
छतरी ताने छाँव
....
पेड़ों के पत्तों पर सोई है ओस।"
प्राकृतिक असंतुलन से जो देश और समाज का नुकसान हो रहा है उस पर भी कवि की
पैनी नजर है-
"गिरा मनाली से भी नीचे,
दिल्ली
का है पारा,
टूटा
कीर्तिमान दशकों का
अभिलेखों
का सारा,
सात
दिनों के लिए चढ़ी है,
लगता
साढ़ेसाती |"
मजदूर और किसानों के दर्द के गायक हैं, शिवानन्द सहयोगी। प्रेमचंद की ही भाँति
इनके यहाँ भी सघन ग्राम्य संवेदना है। इसी से ये जीवंत शब्द चित्र खींचने में समर्थ
हैं-
"खेतों की रखवाली करता
काँप रहा है हलकू,
जमा हुआ
पानी है पीता,
टोंटी का
हर नलकू"
‘सहयोगी’ के इनसान को बड़ा बनाने वाला उनका जन सरोकार पूरी
संवेदना के साथ उनकी रचनात्मक दुनिया में विद्यमान है। इसीलिए वे झूठ,फरेब व अनाचार का बराबर प्रतिकार और प्रतिरोध करते हैं और सत्य के साथ संवाद
में विश्वास करते हैं –
"क्या कोई खुशहाल हुआ है,
पूछेंगे
जाकर होरी से,
धनी हो
गई बहुत दलाली,
उसका
पत्ता कट जाने दो,
फिर
थाने की बात करेंगे।"
प्राय: सभी चर्चित
गीतकारों का अंगीरस भले ही श्रृंगार रस रहा हो पर वे ही गीतकार जनता की जबान पर
रहे जिनका विप्रलंभ प्रबल रहा। लेकिन सूर के संयोग -वियोग दोनों प्रबल हैं।इसी तरह इनके यहाँ
भी संयोग वियोग दोनों प्रभावी रूप में उपस्थित है।फिलवक्त संयोग का एक दृश्य -
"भावगम्य हो गए विशेषण,
संबोधन
बदले,
शब्दवेध
हर गीत तत्व के,
संशोधन
बदले,
ध्वनि
वृंदावन का वंशीवट,
मंथन बहक
गया |
तुम आए, क्या हुआ कि मन का,
आँगन चहक
गया।"
इस संग्रह में गीतकार
किशन सरोज को समर्पित एक शोक गीत भी है। इस गीत की करुणा इतनी सघन है कि हर पाठक
और श्रोता इसके भीतर अपने प्रिय यहाँ तक कि इष्ट के बिछोह के भी प्रतिबिंब देख
सकता है-
"वैतरणी के प्रयत प्रवह में
डूब
गया है चंदन का वन,
आँसू में
डूबी है अभिधा,
समिधा
का भी मन है अनमन,
गीत
विधा से कभी न बदले,
पाला, किशन सरोज!
......
स्नेह
सुधा से भरा पूर्णत:
प्याला, किशन सरोज!"
नवगीतकार राजनीति से
लेकर साहित्य तक में मुखौटों के भीतर के नकली सर्वहारा प्रेम के दंभ को पहचान लेता
है और जब पहचान लेता है तो वह उसे जनता तक पहुँचाने में भी देर नहीं करता-
"समाजवादी बरगद के घर,
बैठा पूँजीवाद,
बात गरीबी
की करता है,
कुर्सी का अनुवाद,
झूठतंत्र
के फुसलावे में,
है चुनाव
का हर मतदाता,
जनमत
डावाडोल,
जनता
चारों खाने चित है।"
इसी कारण भोली जनता-
'झूठ तंत्र के भुलावे में है।' और 'जनमत डावाडोल है' तथा ठगों को सिंहासनारूढ़ करने वाली जनता
खुद "चारों खाने चित है।"
एक गरीब की रोजमर्रा
की जिंदगी से गीतकार बखूबी वाकिफ
है। उसकी छोटी-मोटी बातें तक कवि मन की संवेदना से अछूती नहीं हैं-
"जाते हो बाजार सही है,
घर में
केवल भुना चना है,
ऋण का
भी ठहराव घना है,
लेते
आना,
आटा-चावल-दाल-मसाला,
पैसे
हों तो।"
....
"ठाकुर के घर कार्तिक में जो
काम
किया था, उसका पैसा
अबतक
वहीं उधार पड़ा है
मक्का
मँगरू का लौटाना
जो
सावन में कर्ज लिया था,
सिर पर
साहूकार खड़ा है,
कुआँ
खोदकर खर्च चलाना,
सूरज
डूबे पर घर आना।"
दिन भर खटने के बाद भी जहाँ शाम को आँगन के ऊपर धुआँ उठना जरूरी नहीं उसी का
नाम गरीबी है। इस गरीबी को भी हँस कर सह लेने की ताकत जिसमें है उस मजदूर की
उपेक्षा भला गीतकार कैसे सह लेता। इसीलिए इस विडंबना को गीतकार की संवेदना ने बड़ी
गहराई से स्वर देने की कोशिश की है-
"बातें हँसकर टाल न जाना
लेते
आना,
आटा-चावल-दाल-मसाला
पैसे
हों तो।"
ऋतुओं का सौंदर्य और
उसकी मकरंदी गंध में आसक्त और आबद्ध हमारा सौंदर्य बोध इनके यहाँ भी बहुत कुछ पा
सकता है -
“भँवरों
ने छक छककर खाया,
मकरंदों
का पेठा,
अड़हुल
खड़ा रहा द्वारे पर,
बाँधे
लाल मुरेठा,
फागुन
झूमा मधुशाला में,
लगी
मनौनी।
सूरज
खेल रहा बदरी सँग
आँख मिचौनी |”
इसके अतिरिक्त कुछ और भी दृश्यबन्ध हैं जो गीतकार के राग बोध
की नमी को हम तक पहुँचाते हैं-
"आदर्शों की संगतियों में
रहता आया
गाँव,
सतरंगी
सपनों में जीती
उम्मीदों
की छाँव,
पुरवाई
के आँचल आँचल
बँधी बँधी
है धूप।"
और,
"माँगफूल सोने का, पहनी
सरसों
की हर डाल,
तालाबों
में शोर कर रहे
कमल
हंस शैवाल,
हरी
दूब की कोमल पिच पर,
गुगली
फेंक रहा है सावन,
क्षमता
है, दम है, बॉलर में।"
कोरोना काल का एक
और अलक्षित वारियर है श्रमिक, जिसे भूखों मरने और पैदल चलने को अभिशप्त होना पड़ा
जिसके लिए न तालियाँ बजीं न थालियाँ। शहर का मारा वह
अभागा गाँव भी पहुँचा तो उसे वहाँ प्रवेश नहीं मिला | हजार-हजार मील चली हुई
जीर्ण-शीर्ण देह वाले मन पर इस मनाही का मन भर हथौड़ा तो भी वह नहीं टूटा | यह है
असली आशावाद | इसी को रेखांकित करने और मजदूर के जीवट को सैल्युट करते हुए गीतकार
लिखता है-
"शहर से तो आ गए माँ !
भोर
होते दिन निकलते
गाँव
के बाहर खड़े हैं।
भेज
देना शाम को बस,
चार
रोटी, गरम पानी,
चटपटा
कुछ, हरा मिर्चा,
और
गुड़-भेली सुहानी ।“
कोरोना काल के संकटों को गीतकार ने भी भोगा ही होगा। इसलिए भी मजदूर के गाँव
आने की छटपटाहट को वह पूरी ईमानदारी से स्वर दे सका है-
"कैसे आएँ गाँव “चतुर्भुज!'
रेल मार्ग भी बंद
पड़ा है,
बसें न
चलतीं,
आवाजाही
बंद पड़ी है,
ठीक-ठाक
सब घर पर है न!"
और,
"शहर किलाबंदी के जैसा,
चुप्पी
साधा अगल बगल है,
कालोनी है घरबंदी में,
धूप-छाँह की चहल पहल है,
सहमे-सहमे चौक-चौपलें,
दुर्दिन की यह अजब घड़ी है,
बाकी
तो सब ठीक-ठाक है |’’
'जनसेवा की कथावस्तु' ही बदल गई है क्योंकि दिखावा ही परमार्थ
हो गया है-
"जनसेवा की कथा बाँचते,
जनसेवक
सब पार्थ,
विज्ञापन
पट पर लेटा है,
सार्वजनिक
परमार्थ।"
बेकारी के पहाड़ के
नीचे दबा युवा हाड़ तोड़ श्रम करने के बावजूद वहीं पड़े रहने को विवश है-
"रोजी रोटी के जुगाड़ का,
ढोना
एक पहाड़,
हाड़
तोड़ श्रम करना प्रतिदिन,
नरम
कलेजा फाड़।"
सूरज निकलने का
एकदम अनूठा बिंब कि सूरज 'मोबाइल के टावर पर चढ़ा हुआ' है हमारा ध्यान औचक अपनी ओर खींचता है।यह
बिंब सूचना क्रांति से बदले समय और समाज की भी गवाही देता है। उसे 'काम मिला है।' इसलिए खुशी-खुशी रोशनी दे रहा है-
"मोबाइल के टावर पर है,
चढ़ा
हुआ सूरज,
काम
मिला है।
पहना
है लखनउवा कुरता,
कढ़ा
हुआ सूरज,
दाम मिला है।"
गीतकार 'बहुत दिनों के बाद' काम मिलने की बात
करके मजदूर जीवन के वास्तविक दर्द को उठाकर उन्हें आश्वस्तिकारी जीवन देने और
दिलाने के संकल्प सहित उनके साथ खड़ा मिलता है और गरीबों के लिए सरकारी सहयोग उसे आश्वस्त भी करते हुए लगता है । अत : देर आए
दुरुस्त आए जैसे भाव के साथ खड़ा होता हुआ मिलता है |
"बहुत दिनों के बाद समय की,
नींद
अभी टूटी हो जैसे,
नई
योजना डाल गई हो,
बटुआ
के पाकेट में पैसे।"
संकट काल में कोई
अनासक्त ही सृजन रत रह सकता है अन्यथा ध्यान तो टूटता ही है। लय तो भंग ही होती
है। लेकिन गीतकार शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ का न तो ध्यान भंग हुआ है और न लय टूटी
है। इस अर्थ में ये अनासक्त गृहस्थ हैं। इनके यहाँ करुणा का अजस्र प्रवाह द्रवित
करता है। पर,करुणा का आवेग विवेक के साथ बहा है । इसीलिए
वंचित के दर्दों के साथ उनके तर्क भी हैं और उनसे निजात के संकेत भी। इनके गीत
गरीब और वंचित के जीवन के गेय दस्तावेज हैं। इनके गीतों में मुक्तिबोध की गर्बीली गरीबी और भी अधिक हठीली होकर दुखों से दो-दो हाथ करती
है। इस तरह वह जीवन को असुन्दर होने से बचा लेती है और अपने निसर्ग सौंदर्य के
नाना दृश्यबंध रचती है। इसी जन सरोकार के नाते शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ के
ये गीत किसान और मजदूर जीवन के नि:सर्ग सौंदर्य के गीत भी कहे जा सकते हैं।
कुल सात-आठ महीनों के भीतर रचे हुए ये नवगीत अपनी नवता और नमी दोनों के लिए
सदैव याद किए जाएँगे |
डा. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’
ई-504,श्रृंगाल होम्स,
पंचमुखी हनुमान के पीछे,
वी.आई.पी. मार्ग,
अलथाण,
सूरत-395017
(गुजरात)
दूरभाष-8000691717
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