शिवपुर का ढाला
बहुत कष्ट सहता है,
शिवपुर का ढाला |
पास से गुजरती है,
गंगा की धारा,
खुरपी से रोज दूब,
गर्हता है चारा,
श्रम की हथेली में,
हँसता है छाला |
पुरवा का जमता है
सुबह-शाम डेरा,
कभी-कभी थाने का,
लगता है फेरा,
आंगन का पहरा है,
साँकल का ताला.
पगडण्डी बाढ़ों में,
बनती है गारा,
दहती है छानी, न
आता है नारा,
चरखा न मिलता, न
रूई का गाला |
कुछ भी हो, ढोता है
बोझ हर पसीना,
खरचा न देता है,
वेतनी महीना,
गमलों में अन्तस् के,
खुशियों का थाला |
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