चिरई की टाँग

पीपल पे बैठी है,

चिरई की टाँग |

 

जकड़ी है पंजों से,

डाली की पोर,

आँखों में हलचल है,

चौकस है ठोर,

चुगने को दाने को,

भूख रही माँग |

 

फुदकी गिलहरी की,

इधर-उधर पूँछ,

करती है ताक-झाँक,

एक खड़ी मूँछ,

रिक्शा हथेलियों में,

मसल रहा भाँग |

 

बहुत दिनों बाद धूप,

निकली है आज,

बोरी के गेहूँ को,

फटक रहा छाज,

मोटिया की पीठ पर,

बोझ रखी साँग |

 

सूरज तो गाँव गया,

झूम रही शाम,

सड़कों से जूझ रहा,

दफतर का काम,

भोर हुआ मुरगे की,

जाग उठी बाँग |

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