काला चिट्टा लड़का
गाँव-गाँव में,
शहर-शहर में,
मचा हुआ है शोर,
काला चिट्टा लड़का,
लड़की माँग रहा है गोर |
हाथी पर चढ़कर बैठा है
सज कोष्ठी का अन्वय,
साध रहा है आठ लाख का
सम्यक कुशल समन्वय,
ऊपर से जो देना, देना
खरचा-पानी, चना-चबेना,
लहँगा और पटोर |
अंदर उठँगी रहती, खाली
आँख मूँदकर हाँड़ी,
नहीं कभी कपड़े पर हँसती,
सपने में भी माँड़ी,
घर में एक नहीं है दाना,
एक टेम मुँह खाता खाना,
बड़ा किया है ठोर |
ओरी पर बिरहा गाते हैं,
फूटे थपुए-नरिए,
पड़े हुए अँगना कबाड़ के
टूटे-फूटे सरिए,
सुन-सुन आँखें भर जाती हैं
और सिसकियाँ डर जाती हैं,
बरस रहे हैं लोर |
इस दहेज की बलिवेदी पर,
चढ़ीं दुल्हनियाँ अनगिन,
संवादों के सारे माध्यम,
थके सरासर गिन-गिन,
संविधान-संशोधन चुप हैं,
नाप न पाई कुशल बजाजी,
इस पनहे की कोर |
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें