शास्वत श्रम की अभिव्यंजना करते शब्दचित्र
नवगीत परंपरा में शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ आज एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ‘सहयोगी’ जी की नवगीत यात्रा अनेक आयामों से गुजरते हुए प्रस्तुत कृति ‘खेत पके होंगे गेहूँ के’ तक आ पहुँची है। कुल बाईस से अधिक उनकी काव्यकृतियों में से आठ कृतियाँ नवगीत पर ही केंद्रित हैं। छपने के बाद यह नवाँ नवगीत संग्रह होगा | नवगीत मानव की समग्र चेतना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। ऐसी काव्यात्मक अभिव्यक्ति जिसमें सामाजिक चेतना, लोकतत्व, दार्शनिकता, संगीतात्मकता जैसे तत्व एक साथ ही अपने पूर्ण परिपाक में प्रदर्शित होते हैं। नवगीत जातीयता का गीत है; जिसमें लयबद्धता, सहजता और कल्पनाशीलता के साथ-साथ सामाजिक यथार्थ के दर्शन भी होते हैं। जनधर्मिता और जनोन्मुखता के कारण यह आमजन की बात करता है। पिछले चार दशकों में नवगीत ने बहुत लंबी यात्रा तय की है। अनेक पड़ावों को पार करते हुए नवगीत आज किसी परिचय का मोहताज नहीं रह गया है।अनेक नवगीतकार वर्तमान में नवगीत सर्जन में संलग्न हैं। शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ ग्राम्यबोध के रचनाकार हैं। ग्राम्य-चेतना और ग्राम्य-सुषमा उनके नवगीतों का मूल उत्स है। ग्रामीण जनजीवन के मनमोहक चित्रण में एक ओर जहाँ प्रकृति का अनुराग अंचल ग्रामश्री के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता ‘सहयोगी’ जी के नवगीतों में मिलता है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण जीवन के शोषण-अभाव-अशिक्षा-दैन्य के दारुण चित्र भी उनके नवगीतों में पाए जाते हैं। ध्यान से देखा जाए तो ‘सहयोगी’ जी लोकरंग-लोकमानस-लोकजीवन और लोकसंस्कृति के वाग्मी अध्येता हैं, उसके मनमौजी गायक हैं और उसके संवेदनशील प्रस्तोता भी। गाँव के परिवेश को अपनी सोच और चिंतन में जीवंत बनाकर उसे अपने नवगीतों में प्रस्तुत करने में ‘सहयोगी’ जी पूर्णतया निष्णात् हैं।
आपका प्रस्तुत संग्रह ‘खेत पके होंगे
गेहूँ के’ अपने शीर्षक में भी ग्राम्यबोध की विस्तृत परिकल्पना की
अमंद शाब्दिक अभिव्यक्ति करवाता महसूस होता है। प्रस्तुत संग्रह में अनेक नवगीत
ऐसे हैं जो अपनी संवेदनापूर्ण भाषा और मार्मिकता से पाठक के अंतर्मन को छूने और
उसे भिगोने का पूरा दम रखते हैं।ये नवगीत आमजीवन के सरोकारों और सामयिक संदर्भों
का, जीवन के परिप्रेक्ष्य में, सच्चा चित्रण करते
हैं। संग्रह का पहला ही नवगीत ‘तंग शहर की लड़की’ मजबूरी और लाचारी का प्रत्यक्षीकरण करवाने में सफल है। निम्नलिखित पंक्तियाँ
देखिए-
‘’सरकारी नल पर धोती
है,
तन के मैले कपड़े,
तंग, शहर की लड़की |
उभरे कई सवालों के सँग,
घेरे में है जीती,
यह अच्छा है, संकल्पक है,
जहर नहीं है पीती,
आये हर संकट से जूझी,
रह रह झेले, तगड़े
जंग, शहर की लड़की |’’
सभ्यता का विकास आज चारों ओर दिखाई देता है। इस विकास ने अनेक नये आयाम और
आराम मानव को उपलब्ध करवाये हैं लेकिन इनका वास्तविक परिणाम क्या है, इससे हमने जैसे अपना मुँह ही मोड़ रखा है। इस विषयवस्तु पर ‘सहयोगी’ जी के
अनेक नवगीत मिलते हैं। इनमें समय का बदलाव व्यंग्यात्मक रूप में हम देख सकते हैं। ‘मिल न सके कल’, ‘छोटे शहर बड़े
विज्ञापन’, ‘सिगरेटों की आगजनी तक’, ‘बढ़ते शहर सिमटते
कसबे’ जैसे नवगीतों में यह बात आसानी से देखी जा सकती है। ‘सिगरेटों की आगजनी तक’ नवगीत की पँक्तियों
में मानवीकरण के सुंदर प्रयोग से ‘सहयोगी’ जी अपनी बात रखते हैं-
‘’गमलों के पौधों
की छाया,
मौन किसी से बतियाती है,
अपनी पंखुड़ियों का आँचल,
झाड़-पोंछकर सरियाती है,
किरणों के सँग चुपके-चुपके,
मन प्रसन्न हो रोज पहुँचता,
पोखर वाले रामधनी तक |
उगता सूरज आ जाता
है,
बाहर खिड़की के शीशे में,
घर की छोटी बालकनी तक |’’
‘सहयोगी’ जी प्रकृति चित्रण में
सिद्धहस्त हैं। प्रकृति के मनोहारी रूप आपके नवगीतों में अनेक प्रकार से मिलते
हैं। यूँ तो प्रकृति के लगभग सभी रूपों को आपने अपने नवगीतों का वर्ण्य विषय बनाया
है, परंतु सूरज और नदी आपके प्रकृति चित्रण में प्रमुख विषय
बनकर सामने आते हैं। आपके दो पूर्ववर्ती नवगीत संग्रह ‘सूरज भी क्यों बंधक’ और ‘नदी जो गीत गाती है‘ भी सूरज और नदी के
प्रतीकों के प्रति आपका प्रेम प्रदर्शित करते हैं। प्रकृति अपने आप में एक परम्परा
है, एक आदिम संस्कृति है। इस परम्परा और संस्कृति को आधुनिकता
से संयोजित कर, सौंदर्यबोध के साथ
उसकी प्रस्तुति करने में ‘सहयोगी’ जी सक्षम भी हैं और सफल भी। आप के अधिकांश नवगीतों में महानगरीय भागदौड़ से ऊब
और इससे बाहर निकलने की छटपटाहट है। इस ऊब और भागदौड़ से बचने का एक ही माध्यम
दिखाई देता है; और वह है प्राकृतिक
सुषमा का सात्विक हृदय से अवलोकन। ‘सूरज भागा गाँव’, ‘ठंड हुई शहराती’, ‘हँसी-खुशी का डोला’, ‘एक रात की पीर’, ‘आँगन बैठी धूप’, ‘हरियाली है हँसमुख’, ‘चिलबिली है धूप’ आदि अनेक नवगीत प्रकृतिपरक हैं। कल्पना का एक सुंदर चित्रण देखिए-
‘’वटवृक्षों की टहनी-टहनी,
है कलरव की गूँज,
रस्सी की साड़ी की चुन्नट,
में हँसती है मूँज,
रेंड़ी की चट-चट की सुमधुर,
ध्वनि-बँसुरी है धूप |
कुसुमों की है घनी वाटिका,
खिली-खिली है धूप |’’
कवि अपने युग सत्य से मुँह नहीं मोड़ सकता। समाज की समकालीन और सामयिक
संवेदनाओं का चित्रण करना कवि का धर्म भी है और दायित्व भी। शाब्दिक चेतना जब युग
के यथार्थ का चित्रण करती है, संवेदना की सहायता
लेती है। यह संवेदना जितनी तीव्र और गहरी होती है, कवि की अनुभूतियाँ
भी उतनी ही सजग और सफल होती हैं। ‘सहयोगी’ जी सामाजिकता से उदासीन नहीं हैं। उनके नवगीतों में समाज के छोटे-बड़े
प्रत्येक वर्ग का चित्रण मिलता है। अपने नवगीतों में वे अपने परिवेश के चारों ओर
स्थान लेती घटनाओं और परिस्थितियों पर भी पैनी दृष्टि रखते हैं। ‘सहयोगी’ जी के नवगीतों के कथ्य इसीलिए टटके और ताजा लगते हैं क्योंकि
घटना विशेष को काव्यगत संवेदनाओं के लयात्मक बंधनों में शब्दायित करना उन्हें
बखूबी आता है। अपने पिछले नवगीत संग्रहों में वे इस बात को प्रमाणित करते आए हैं।
प्रस्तुत संग्रह में भी आपको अनेक ऐसे नवगीत पढ़ने को मिलेंगे जो समसामयिक घटनाओं
को आधार बनाकर रचे गए हैं। ‘वार्ता के संवाद’ शाहिन बाग पर आधारित है-
‘’माँगों के हर
विज्ञापन का,
पीठ चढ़ा वैताल,
फैल गया है कुंठाओं का,
तर्कहीन शैवाल,
है हठता पर अड़ी हुई यह,
शाहिन की बकवाद |
रहते मत वैभिन्य निरर्थक,
वार्ता के संवाद |’’
‘शाहिन बाग गए’ में भी इसी स्थिति का चित्रण है। यहाँ प्रतीकों के माध्यम से कवि ने अपनी बात
रखी है-
‘’शोर मचाते, हवा बनाते,
काले नाग गए,
पहुँच वे शाहिन बाग गए |
सड़क बंदकर
आमजनों की,
हँसती थी बिरयानी,
दादा-नाना छिपे हुए थे,
आगे दादी-नानी,
मुरगे जो थे रहे लड़ाते,
गोली दाग गए,
खेलकर खूनी फाग गए |’’
वर्तमान समय में संपूर्ण विश्व कोविड-19 महामारी से जूझ रहा
है। एक ऐसा विपद्काल जिसमें मानव सभ्यता को बहुत कुछ अनचाहा-अनदेखा देखना-सहना
पड़ा है। एक ऐसी महामारी जिसका अभी तक कोई भी उपचार नहीं मिल पाया है। सरकारों ने
इस बीमारी का फैलाव रोकने के लिए अपनी ओर से यथासंभव प्रयास किए। इन्हीं प्रयासों
में से एक प्रयास था ‘संपूर्ण लॉकडाउन’। अचानक से लगाए गए इस लॉकडाउन के समक्ष संपूर्ण मानव सभ्यता की उत्तरोत्तर
प्रगति के पहिए मानो थम-से गए थे। सभ्यता ने भय-आशंका-संत्रास-पीड़ा; सब कुछ देखा-भोगा। परंतु इस समय में सबसे अधिक कष्ट किसी ने यदि उठाया तो वह
था श्रमिक वर्ग। अपने ही देश में प्रवासी श्रमिक का नाम पाकर उसे दर-दर की ठोकरें
खाने को भी मजबूर होना पड़ा। ‘सहयोगी’ जी के हृदय में वक्त के मारे इन मजदूरों को लेकर करुणा की लहरें स्पंदित होती
हैं और वे इन्हें अपने कथ्य का विषय बनाते हैं। संग्रह में अनेक ऐसे नवगीत आपको
मिल जाएँगे, जिनमें धूप में जानी-अनजानी राहों पर चलते-घिसटते श्रमिकों
के पीड़ादायक सफर का मार्मिक दृश्यानुवाद ‘सहयोगी’ जी की कलम से निकला है। ‘घर जाने दो’, ‘गाँव के बाहर खड़े हैं’, ‘बाकी तो सब ठीक-ठाक
है’, ‘कोरोना की करुण कथाएँ’ जैसे नवगीत कोरोना
काल की त्रासदियों पर आधारित हैं। संग्रह का शीर्षकगीत ‘खेत पके होंगे गेहूँ के’ में भी इसी कोरोना
काल की ही मार्मिक अभिव्यक्ति है। खेतों में गेहूँ की बालियाँ पककर तैयार हो गई
हैं। मजदूर अपने घर-गाँव से दो पैसे की मजदूरी की लालच में दूर रह रहे हैं और
नौकरी कर रहे हैं। लॉकडाउन की विषम परिस्थितियाँ उन मजदूरों को घर,गाँव,खेत,खलिहान की याद दिला
रही हैं। ऐसे ही एक श्रमिक के उद्गार द्रष्टव्य हैं-
‘’शहर बंद है,बैठे-बैठे,
तंग करेगी, भूख-मजूरी,
तंग करेंगे हाथ-पैर ये,
सामाजिकता की वह दूरी,
ठेला पड़ा रहेगा घर में,
गाँव चले हम,
आलू-मेथी-धनिया करने,
अरे! कोरोना! तुझे नमस्ते |
खेत पक्के
होंगे गेहूँ के,
गाँव चले हम,
करनी-बसुली-कटिया करने,
अरे! कोरोना! तुझे नमस्ते |’’
एक मजदूर के आत्म की संकल्पनात्मक अनुभूतियों का सटीक
चित्रण ‘सहयोगी‘ जी यहाँ करते हैं।
उनकी ग्रामीण चेतना उत्कृष्ट रूप में यहाँ दृष्टव्य है। ऐसा ही एक और चित्रण निम्नलिखित
पंक्तियों में भी मिलता है-
‘’कई किलोमीटर की
दूरी,
पैरों ने है नापी,
खुली आँख से सब कुछ
देखा,
सूरज प्रज्ञ प्रतापी,
महँगाई के बाजारों में,
मधुशाला के संसारों में,
दिनभर भटकी पस्ती |
तप्त तवा-सी इन सड़कों पर,
शहर छोड़कर निकल पड़ी है,
मजदूरों की बस्ती |’’
भारतीय चिंतन परंपरा में ‘सर्वभूत हिते रताः’ का भावतत्व सदैव रहा है। इसी को आधार मानकर हमारा सारा साहित्य रचा भी गया है।
भावों की यात्रा करते समय विचारतत्व को हमारा साहित्य कभी भी छोड़ता नहीं है। जीवन
के सभी रंग-ढंग विचारतत्व को सामने लाने में भावतत्व का ही आश्रय लिया करते हैं। ‘सहयोगी’ जी के नवगीतों में विचार और भाव, दोनों ही तत्वों का सार्थक
और सुंदर समन्वय दिखाई देता है। एक ओर जहाँ वे जीवन की आपाधापी, भागदौड़ और आधुनिकतम होती जा रही परिस्थितियों से विचारतत्व ग्रहण करते हैं, वहीं अपने हृदय की काव्यगत संवेदनाओं को इनसे संयोजित कर भावतत्व का वरण करते
हैं। यही कारण है कि उनके नवगीत सरस और गहन चिंतन की अरुणाभा से परिपूर्ण रसमयी
अभिलेख दिखाई देते हैं। ‘सहयोगी’ जी मूलतः भोजपुरी क्षेत्र के हैं। अतः उस
क्षेत्र-विशेष की वाणी की मिठास उनके सर्जन में आना स्वाभाविक ही है।
क्षेत्र-विशेष के अनेक शब्द उनके नवगीतों में गुँथे हुए-से लगते हैं। ‘टंकी के
शहरों में’ जैसे कुछ गीत इन्हीं शब्दों से पिरोए हुए हैं। डोर, खोंइछा, फाँड़, उठँगी, चाँचर, मार्हा, माची आदि शब्द इन
नवगीतों का सौंदर्य बढ़ाते हैं।
‘सहयोगी’ जी के नवगीतों में
आंचलिक शब्द, मुहावरे, बिंब-प्रतीक प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। अपनी बात को कहने-रखने का तरीका ‘सहयोगी’ जी को समकालीन अन्य अनेक नवगीतकारों से अलग करता है। यहाँ
केवल कोमलकांत भावनाएँ या मोहक दृश्य ही प्रस्तुत नहीं किए गए हैं, अपितु कवि मनुष्यता के अच्छे-बुरे सभी पहलुओं का चित्रण करते हुए उनकी पीड़ा
में ही अपनी पीड़ा को भी मिला लेता है। ‘सहयोगी’ जी की ये अनुभूतियाँ ईमानदार अनुभूतियाँ ही कही जानी चाहिए। उनके नवगीतों का सबसे
अधिक महत्वपूर्ण गुण है चित्रात्मकता। अनुभूतियों की सघनता और भावों का सहज प्रवाह
जब उनके नवगीतों के रूप में शब्दांकित होता है तो एक चित्र-सा पाठक के सामने उत्पन्न
करता है। ‘सहयोगी’ जी की नवगीत चेतना
मन के धरातल को छूती है। मानव संस्कृति के अनेक आयामों का शाब्दिक आस्वादन यदि
करना हो तो ‘सहयोगी’ जी के नवगीत पढ़े
जाने चाहिए। उनके नवगीतों में भाषा की बनावट और बुनावट सीधी-सादी है परंतु उनका
अर्थबोध कहीं अधिक गहरा है। उनके नवगीत मात्र शब्दों का संयोजन भर नहीं हैं, अपितु
मानव की सुख-दुख, हार-जीत, हानि-लाभ जैसी भावनाओं की सार्थक आवेगमयी अभिव्यक्तियाँ हैं।अलौकिक अनुभव और
कविता की सहज अनुभूतियाँ-ये दोनों मिलकर शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ के नवगीतों का निर्माण करते हैं । ‘खेत पके होंगे गेहूँ के’ के नवगीत अपनी
काव्यगत् संवेदनाओं की स्वेदसिक्त किंतु स्वादपूर्ण फलित अभिव्यंजनाओं से हम सबकी
साहित्य-क्षुधा को शांत करेंगे,ऐसी मंगलाशा है।
डॉ नितिन सेठी
सी-231, शाहदाना कोलोनी
बरेली- 243005, उ.प्र.
दूरभाष- 9027422306
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