समझ में आता नहीं यह

समझ में आता नहीं यह,

किस तरह का दौर है |

 

आदमी हर आदमी से

दूर है, संदेह में,

क्षति पहुँच जाए न कोई,

छटपटाहट देह में,

है अचंभित भाव-व्यंजन,

छिना मुँह का कौर है |

 

पेड़ के पत्तों में डर है,

हैं डरातीं टहनियाँ,

हो उपेक्षा, धाँधली न,

हैं सशंकित धमनियाँ,

जोहता फागुन टिकोरा,

संशयित हर बौर है |

 

शहर जाना चाहता है,

लौट अपने गाँव में,

उपज की अँगड़ाइयों में,

बरगदों की छाँव में,

सोचती है नागरिकता,

सोचता हर पौर है |

 

बुन रहा दायित्व उभरा,

चादरा सुख-शान्ति का,

वह गिराना चाहता है,

बंध फैली भ्रांति का,

आकलन में है प्रशासन,

अन्वयन पर गौर है |

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