कई किलोमीटर की दूरी

तप्त तवा सी इन सड़कों पर,

शहर छोड़कर निकल पड़ी है,

मजदूरों की बस्ती |

 

इनकी मजबूरी का कारण,

कोरोना-अवगुंठन,

पूँजीवादी नग्न व्यवस्था

की कृतघ्नता, गंजन,

जटिल जेठ की नोक-झोंक की,

रक्त चूसती भूख-जोंक की,

राजनीति की मस्ती |

 

दूर-दूर तक नहीं दिखा है,

आयामन आयामी,

राजमार्ग की मृगतृष्णा में,

झलक रही नाकामी,

मिलने कभी न आई घर से,

भूख-प्यास के उमड़े स्वर से,

वह सरकारी हस्ती |

 

कई किलोमीटर की दूरी,

पैरों ने है नापी,

खुली आँख से सब कुछ देखा,

सूरज प्रज्ञ प्रतापी,

महँगाई के बाजारों में,

मधुशाला के संसारों में,

दिन भर भटकी पस्ती |  

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अरे ! बादलो !!

ठण्ड हुई शहराती

कोरोना की करुण कथाएँ