सूर्य संकट में पड़ा है

सूर्य संकट में पड़ा है,

धूप के घर में अँधेरा,

झूम निकलेगी नहीं |

 

बादलों के शहर में है,

आँधियों का बोलबाला,

जेठ का मुँहफट महीना,

जल रहा निष्ठित निवाला,

छान का छप्पर उड़ा है,

संशयों से मन जुड़ा है,

धूम निकलेगी नहीं |

 

बँट रहा घर-घर निमंत्रण,

फसल कल घर आ रही है,

प्रगम के नव गाँव में सुधि,

जा मड़ैया छा रही है,

काढ़ घूँघट जा रही है,

सुख अनन्तिम पा रही है,

घूम निकलेगी नहीं |

 

सड़क चौड़ी है, घरों की

मिल रहीं पगडण्डियाँ भी,

सज रहीं चारों तरफ कुछ

झलझलातीं झण्डियाँ भी,

हवा कुछ-कुछ है लजीली,

गली की है आँख गीली,

चूम निकलेगी नहीं |

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