शब्द-सूरज निकलता है

भावमय डोली उठाए,

हृदय के सौरभ क्षितिज से,

शब्द-सूरज निकलता है |

 

आंतरिक अनुभूतियों की

चूड़ियों की खनक खन-खन,

मन चमन में उड़ रहे उस

भ्रमर की ले भनक भनभन,

लग रहा संवेदना के

वायुमंडल-आर्द्रता का

एक पर्वत पिघलता है |

 

आधुनिकता की नदी में

मारता है वह डुबकियाँ,

अर्थ-रेती पर बिछाता

दर्द-जाजिम की सिसकियाँ,  

हर अँधेरी बस्तियों का

जो उजाला है शहर का,

वह अँधेरा निगलता है |

 

वह उदय की एक कविता

की द्विभा को लिख रहा है,

है अकेला, साथ कोई

भी नहीं तो दिख रहा है,

एक चक्राकार पथ पर

समय के वह चल रहा है,  

नहीं खटका, विचलता है |

 

वह बहुत निष्काम सेवा

सृष्टि के घर कर रहा है,

वह जनम से जिन्दगी का

रिक्त कुठला भर रहा है,

है अपरिचित और अभिरत,

है नहीं उसकी कहीं छत,

नहीं कोई विकलता है |

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