ठगे से आकुल श्रमिक
छोड़ रोजी का शहर, वे
गाँव को पैदल चले हैं,
सून सड़कों पर बढ़े हैं,
ठगे से आकुल श्रमिक |
जो मिला, खाया उसी को,
रोटियों की भेंट,
हाथ खाली, पड़ी खाली
धोतियों की टेंट,
क्रूर ट्रक कुचले-छले हैं,
मार्ग कदमों के तले हैं,
कष्ट के शीशा मढ़े हैं,
ठगे से आकुल श्रमिक |
पहन झलकायुक्त चप्पल,
रख रहे हैं धैर्य,
गठरियाँ सिर पर अवस्थित,
वैजयिक ऐश्वर्य,
अंग ताँबे में ढले हैं,
स्वस्थ हैं, अच्छे-भले हैं,
गिलट हैं, पानी चढ़े हैं,
ठगे से आकुल श्रमिक |
रात की हर चाँदनी में,
है नहाती प्यास,
धुन बजाता सांत्वना की,
बाँसुरी का श्वास,
साहसिकता-खत लिये हैं,
धुंध में जलते दिये हैं,
पाठ चलने का पढ़े हैं,
ठगे से आकुल श्रमिक |
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