शोर से संवाद
हम नए शब्दों के घर में
आ गए हैं |
स्वप्न की शब्दावली को
छोड़ आए,
बिन पढ़े पन्ने समय के
मोड़ आए,
आह के परिशिष्ट जितने
पा गए हैं |
एक अभिधा सृष्टि की जो
फिर रही थी,
सिन्धु में मन की तरी सी
तिर रही थी,
जले दीये अक्षरों के
भा गए हैं |
शोर से संवाद आँधी
कर रही है,
झनक में रस का रसायन
भर रही है,
गीत के बादल गगन में
छा गए हैं |
कथ्य गुंजित घाटियों को
चुन लिया है,
हर व्यथा की लघुकथा को
सुन लिया है,
ध्रुपद अपनी व्यंजना का,
गा गए हैं |
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