टंकी के शहरों में

खड़े हैं कटघरों में  

फसलों के गाँव.

जोत चढ़ी रधिया की,

बुधई के नाँव |

 

कोट-पैंट पहने है

बदली की, धूप,

टंकी पे लटके हैं,

शहरों में कूप,

विधवा सी मरुथल में,

कीकर की छाँव |

 

तालों के पनघट हैं,

कूड़ों के ढेर,

जलकुम्भी नदियों के,

जुएँ रही हेर,

गेहूँ के खेतों में,

ईंटों के पाँव |

 

ठुमरी है भूल गया,

पंछी का ठोर,

आठ बजे जगता है,

आंगन का भोर,

फागुन की गलियों में,

कौओं के काँव |

 

खोंइछा न पाता है,

लज्जा का फाँड़,

चीनी में उठँगी है,

गन्ने की खाँड़,

पछवाँ का जोर हुआ,

पुरवा के ठाँव |

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