कैसे आएँ गाँव ‘ चतुर्भुज ’ ! रेल - मार्ग भी बंद पड़ा है , बसें न चलतीं , आवाजाही बंद पड़ी है , ठीक - ठाक सब , घर पर है न ! दस से दो तक बैंक खुल रहे , सामाजिकता की भी दूरी , आटा - चावल की दुकान पर , लंबी लाइन की मजबूरी , सब्जीवाले जब - तब आते , और दूध की लड़ा - लड़ी है | शहर किलाबंदी के जैसा , चुप्पी साधा अगल बगल है , कालोनी है घरबंदी में , धूपछाँह की चहल - पहल है , सहमे - सहमे चौक - चौपलें , दुर्दिन की यह अजब घड़ी है | चारोंओर सशंकित हैं स्वर , आतंकित है कोना - कोना , शेयर - पूँजी उथल पुथल है , संकट में हैं चाँदी - सोना , सर्दी - ज्वर - खाँसी का होना , कोरोना की जुडी कड़ी है | घर में रहना आवश्यक है , यही असुविधा यही असर है , पड़ा शहर के एक किनारे , छोटा सा यह अपना घर है , सदा हाथ साबुन से धोना ही बचने की एक जड़ी है | दादी सौ के ऊपर पहुँचीं , दो दिन से बीमार पड़ी हैं , कहतीं ‘ लवकुश ’ को बुलवा दो , इसी बात पर अड़ी पड़ी हैं , बाकी तो सब ठीक - ठाक है , माँ को लानी एक छड़ी है |
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