जय हो पेड़ बबूल

 


 

हरे-हरे पत्तों की टहनी,

पीले-पीले फूल,

जय हो पेड़ बबूल |

 

सुनते आये पूर्वज कहते,

तुम देवों के वास,

पोषक तत्वों और खनिज की,

गठरी रखते पास,

जगह-जगह नित दिख जाते हो,

ओढ़े भव्य दुकूल |

 

छाल सौरभित सह लेती है,

ऊँचा-नीचा ताप,

ध्येयनिष्ठ हो, ध्यान-मग्न तुम  

संन्यासी का जाप,

लगी फली अभिनंदन करती,

हर आहट का झूल |

 

चाँदी का पहरा ले, उभरे

हैं शरीर पर दाग ,

खेले हों मानों मौसम ने,

कुछ दिन पहले फाग,

काँटे हैं, पर कभी न बनते,

आगंतुक को शूल |

 

वाताप्रथमा शीतन करती,  

गरमी की हर छाँव,

थके पथिक के रुकने का हो,

तुम छोटा सा गाँव,

आगति कष्ट उठाए कोई,

कभी न करना भूल |

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