संदेश

अगस्त, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नवगीत, नई कविता का एक महानगर और गीत का छोटा सा गाँव है

                    हिंदी साहित्य के वर्तमान परिपेक्ष्य में नवगीत रचनाओं के नये क्षेत्र बहुत ही विस्तार लिए हुए हैं और भविष्य में भी लेंगे, जो नवगीत की मिट्टी के घर की नींव को पक्कापन देंगे और दीवारों को लीपकर उनका सौंदर्यीकरण लगातार करते रहेंगे | नवगीत की मंजुलता के आंगन में बैठा हर पंछी सदैव पंख फड़फड़ाता और खुले में रहनेवाले मयूर की तरह शब्द-नर्तन करता ही रहता है, सदैव करेगा | रचनाकार के शब्द और शब्दिता कभी किसी मंजूषा में कैद नहीं रह सकते | रचनाकार की वाणी सदैव नीर-क्षीर विवेकी होती है | यदि यह संभव नहीं होता तो साहित्य की स्वर-धारा का विलय कभी का एक सन्नाटे में हो गया होता | साहित्यकार को सत्ता के पास रहकर भी उसके गुण-दोष को सदा जाज्वल्यमान करते रहना चाहिए | उसका निष्पक्ष होना बहुत आवश्यक है | गीत, नवगीत के सोपान तक आते-आते कई रूपों और प्रारूपों में साहित्य के पन्नों और समाज के जनमानस में उछलकूद करता रहा है, उपस्थित रहा है | गीत पहले गीत नहीं था | यह स्वयं एक संगीत था, संगीत का एक राग था ‘ध्रुवा’, ध्रुवपद’, ‘ध्रुपद’ | संगीत के इस ‘ध्...

शास्वत श्रम की अभिव्यंजना करते शब्दचित्र

                नवगीत परंपरा में शिवानन्द सिंह ‘ सहयोगी ’ आज एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ‘ सहयोगी ’ जी की नवगीत यात्रा अनेक आयामों से गुजरते हुए प्रस्तुत कृति ‘ खेत पके होंगे गेहूँ के ’ तक आ पहुँची है। कुल बाईस से अधिक उनकी काव्यकृतियों में से आठ कृतियाँ नवगीत पर ही केंद्रित हैं। छपने के बाद यह नवाँ नवगीत संग्रह होगा | नवगीत मानव की समग्र चेतना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। ऐसी काव्यात्मक अभिव्यक्ति जिसमें सामाजिक चेतना , लोकतत्व , दार्शनिकता , संगीतात्मकता जैसे तत्व एक साथ ही अपने पूर्ण परिपाक में प्रदर्शित होते हैं। नवगीत जातीयता का गीत है ; जिसमें लयबद्धता , सहजता और कल्पनाशीलता के साथ-साथ सामाजिक यथार्थ के दर्शन भी होते हैं। जनधर्मिता और जनोन्मुखता के कारण यह आमजन की बात करता है। पिछले चार दशकों में नवगीत ने बहुत लंबी यात्रा तय की है। अनेक पड़ावों को पार करते हुए नवगीत आज किसी परिचय का मोहताज नहीं रह गया है।अनेक नवगीतकार वर्तमान में नवगीत सर्जन में संलग्न हैं। शिवानन्द सिंह ‘ सहयोगी ’ ग्राम्यबोध के रचनाका...