किशन सरोज

गीतों के सुरभित फूलों की

माला, किशन सरोज  !

 

पीड़ा की अनुभूति हुई जो,

शब्दों में अभिव्यक्त मनोहर,

अलंकार सौन्दर्य बने फिर,

भाषा की अनुरक्त धरोहर,

स्वस्थ प्रेम-मकड़ी का शाब्दिक

जाला, किशन सरोज !

 

करुण कथाओं के सौरभ का,

जहाँ हुआ है स्वर-अभिषेचन,

समयोचित आदर पाया है,

आदर्शों का रम्य विवेचन,

सार्वजनिक सुख-दुःख का दीया,

आला, किशन सरोज !

 

भावों की नैसर्गिक छवि में,

शैली की है अनुपथ सुषमा,

फैली है सामाजिकता की,

पंक्ति-पंक्ति में क्षैतिज उष्मा,

स्नेह-सुधा से भरा पूर्णत:

प्याला, किशन सरोज !

 

वैतरणी के प्रयत प्रवह में,

डूब गया है चंदन का वन,

आँसू में डूबी है अभिधा,

समिधा का भी मन है अनमन,

गीत-विधा से कभी न बदले

पाला, किशन सरोज !

 

(08.01.2020 को स्वर शिरोमणि किशन सरोज की मौत के बाद स्वर तरंगित एक गीत.)

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