किशन सरोज
गीतों के सुरभित फूलों की
माला, किशन सरोज !
पीड़ा की
अनुभूति हुई जो,
शब्दों में
अभिव्यक्त मनोहर,
अलंकार
सौन्दर्य बने फिर,
भाषा की
अनुरक्त धरोहर,
स्वस्थ प्रेम-मकड़ी का शाब्दिक
जाला, किशन सरोज !
करुण कथाओं के
सौरभ का,
जहाँ हुआ है
स्वर-अभिषेचन,
समयोचित आदर
पाया है,
आदर्शों का
रम्य विवेचन,
सार्वजनिक सुख-दुःख का दीया,
आला, किशन सरोज !
भावों की
नैसर्गिक छवि में,
शैली की है
अनुपथ सुषमा,
फैली है
सामाजिकता की,
पंक्ति-पंक्ति में क्षैतिज
उष्मा,
स्नेह-सुधा से भरा पूर्णत:
प्याला, किशन सरोज !
वैतरणी के
प्रयत प्रवह में,
डूब गया है चंदन
का वन,
आँसू में डूबी
है अभिधा,
समिधा का भी
मन है अनमन,
गीत-विधा से कभी न बदले
पाला, किशन सरोज !
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