वह बूढ़ातालाब
सहता ही आया है अबतक,
सुख-दुख के उन दायित्वों
के,
अनगिन-अनगिन भार,
वह बूढ़ातालाब |
जितने आते प्यासे, उतने
भर अँजुरी जल
पीते,
पशु, पक्षी, जलजीव-मछलियाँ,
इतरा-इतरा जीते,
जोड़ लिया है
बिन परिचय ही,
हर जीवन के संबंधों से,
संवादों का तार,
वह बूढ़ातालाब |
पानी की लहरों
ने आकर
काटे गझिन
किनारे,
एक-एककर दूर हो गए,
वट के छत्र सहारे,
फिर भी कठिन
समस्यायों के,
स्वार्थरहित अभिलाषाओं
के,
हल ढूँढ़े हर
बार
वह बूढ़ातालाब |
अन्तस् में भी
पाले था, उन
सुधियों की
सुविधाएँ,
जीने की हर
विधा-विधा की
लिखी सहज कविताएँ,
बदला कभी न और
न बदले,
जनमानस से
मिला हुआ जो,
सात्विकता का
सार,
वह बूढ़ातालाब |
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