छोटे शहर बड़े विज्ञापन

युग विकास की चमक-दमक का,

जाने क्यों ऐसा लगता है,

छोटे शहर बड़े विज्ञापन |

 

फैली है चहुँओर विषमता,

कौतूहल है, चुभना काँसा,

घुँइयाँ छील रहा है शासन,

पापड़ भून रहा है झाँसा,

अक्षर अक्षर मौन खड़ा है,

भाव तमाशा, लय का पाँसा,

पीड़ा के घर में सूनापन |

 

मृग-मरीचिका दौड़ रही है,

हरियाली के कुल गाँवों में,

ईंटें हैं दीवार बन गईं,

जूते फटे हुये पाँवों में,

छोड़ मुहल्ला गईं हवायें,

जहरी धूप बसी छाँवों में,

क्या सच है, होना सत्यापन |

 

भरत-मिलाप नहीं है होता,

शब्दों का भी भाव न नत है,

पानी लड़ता है टंकी से,

और झगड़ती नवला छत है,

आँच गई गढ़-गंग नहाने,

निर्माणों की निर्मम गत है,

लुप्तप्राय मन का भोलापन |

 

रोज कमाना, तवा चढ़ाना,

सुबह शाम की रोटी का क्रम,

बंद नहीं होता आँखों से,

आँसू का छल-छल स्वर सरगम,

घर की चौखट छोड़ चुके हैं,

छठी घाट के अनुपद संगम,

चूल्हों-चौकों के अपनापन |    

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