झुनिया पकड़ रही है सुग्गा

 बचपन के दिन बीते, फिर भी,

झुनिया पकड़ रही है सुग्गा |

 

आमों की हर अमराई पर,

अब भँवरों की आँख गड़ी है,

पढ़ी लिखी दुनियाई, लेकिन

पथ भूली, अनजान घड़ी है,

बदले दिनमानों के मौसम,

संध्या बदल रही है लुग्गा |

 

अभी चुराकर एक चाँदनी,

कोई चंद्रकिशोर गया है,

न्योता करने धूप गई है,

उसे लिवाने भोर गया है,

किरणों की अगुआई में चल,

अभी अभी है सूरज उग्गा |

 

अभी जनवरी नई सदी की,

भूखी, प्यासी और दुःखी है,

गाँव-शहर की झोंपड़पट्टी,

भूती, दासी, रूक्षमुखी है,

उन्नति की इस नई सड़क पर,

चुगता निडर कबूतर चुग्गा |

 

जागे राजभवन पर रहता,

बिजली के बल्बों का पहरा,

पगडण्डी के सँग-सँग चलता,

कुहरा लिये अँधेरा गहरा,

अचरज, बच्चा बेच रहा है,

थाली में भर गुड़-तिलभुग्गा |

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अरे ! बादलो !!

ठण्ड हुई शहराती

कोरोना की करुण कथाएँ