बढ़ते शहर सिमटते कसबे
बढ़ते शहर सिमटते कसबे
खेती डरकर भाग
रही है |
खेल रहा बौने
पेड़ों से,
सार्वजनिक हर
उपवन,
हरियाली की जड़
में दीमक,
बढ़ा रही है
उलझन,
हवा प्रदूषित
धवल धरा पर,
रह-रह गोली दाग रही है |
नदियों से
नालों का मिलना,
चरचा में है, खासा,
गंगाजल ने बेच
दिया है,
संगमवाला बासा,
सड़क किनारे
विवश भूख चुप,
जर्जर धोती
ताग रही है |
फूट गई है कई
साल से,
निर्मल जल की
गगरी,
अगर-मगर में फँसी हुई है,
सिंहासन की
पगरी,
गहन समस्या
सिर पर बैठी,
चिलम बोझती आग
रही है |
संविधान-परिषद है गुमसुम,
संवादों में
कड़की,
जीवित आज जला
दी जाती,
संस्कार की
लड़की,
संविद भी सरकार नहीं है,
नीति चाशनी
पाग रही है |
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