अरी ! नौकरी !!
अरी ! नौकरी !! है उलाहना,
काम कराकर, पहली तिथि को,
नहीं दिया है
वेतन क्यों?
समयोपरिभत्ता
ड्यूटी से,
अधिक काम का
छेना,
महँगाईभत्ता
है शायद,
बंधक रख कुछ
देना,
कहीं बहुत कुछ, कहीं किया यह,
सिर ढँकने का, छोटा सा ही,
नहीं दिया है
केतन क्यों?
स्वास्थ्यचिकित्सा
के बिल का धन,
नहीं हुआ है
चुकता,
चक्कर काट रहे
हैं, दावे,
कौआ दाना
चुगता,
इस सामाजिकता
के युग में,
भ्रष्ट
व्यवस्था की मुद्रा को,
नहीं दिया है
चेतन क्यों?
घाटे से अब
जूझ रही है
जन-हित की हर सेवा,
सूख गई है
सतलज कोई !,
या सूखी है
रेवा !!,
जन-सेवा में लगा हुआ है,
जन-अधिकारों का रक्षक तो,
भूख रही है निर्धन क्यों?
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