शाहिन बाग गए
शोर मचाते, हवा बनाते,
काले नाग गए,
पहुँच वे शाहिन
बाग गए |
जो भाषण के ‘एटम-बम’ थे,
समय किया
निर्धारित,
बिना बहस के
खुले मंच पर,
हुआ विधेयक
पारित,
कुछ तो खोए
भीड़तंत्र में,
कुछ हैं भाग
गए ,
लगा दामन में
दाग गए |
आजादी कुछ
माँग रहे थे
जो थे
अवसरवादी,
गठबंधन की जोड़-जुगत से,
नई हुई थी
शादी,
दिल्ली की
रोटी को दंगे-
शीरा पाग गए,
स्वार्थ के
अंधे जाग गए |
सड़क बंदकर
आमजनों की,
हँसती थी
बिरयानी,
दादा-नाना छिपे हुए थे,
आगे दादी-नानी,
मुरगे जो थे
रहे लड़ाते,
गोली दाग गए,
खेलकर खूनी
फाग गए |
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