मिल न सके कल
आये थे घर, लौट रहे अब,
मिल न सके कल, इसका दुःख है,
मिल सकते हैं, अगली बार |
होटल है
चौरासी मंजिल,
रहने की है
नहीं असुविधा,
प्राणवायु की
हलदहात है,
किन्तु
प्रदूषण की है दुविधा,
सात समुंदर
पार शहर है,
जंबु द्वीप पर
प्राणिक घर है,
जहाँ निवसते
नये विचार |
रात और दिन
सूरज चंदा,
गति की माला
पिरो रहे हैं,
दुःख की पीड़ा
जब रोती है,
आँसू आँखें भिगो रहे हैं.
एक असंगति की
कोठी में,
मार पालथी
बैठा स्वर है,
संदेशों का है
संचार |
सुधियों की
तलछट के नीचे,
भावों के कुछ
गाँव बसे हैं,
जिस पथ से
गुजरे हैं पूर्वज,
इतिहासों के
पाँव कसे हैं,
कौशल मीलों
मील चला है,
उड़े प्राण
पंछी के पंखे,
पार कर चुके
पारावार |
हलदहात- विवाह
में हल्दी चढ़ाने की रस्म |
प्राणिक-
प्राणियों का |
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