फागुन मटर-पनीर
खाता है हर रोज शब्द का,
लाया फागुन मटर-पनीर |
आँखों के आंगन में जागा,
हरियाली का
ललित वसंत,
सुधियों के संगम पर उतरा,
पुरवाई का
कपिल अनंत,
स्वागत में
हैं जुटे समय के,
रोली चंदन चटक
अबीर |
पंखुड़ियों का
झब्बा पहने,
पतझर की हर
त्रासित डाल,
कोमल कांत नये
उत्पल से,
सँवर रहा
शुचिता का ताल,
जल-क्रीडा में मगन हो गए,
यात्राओं के
शिथिल शरीर |
धीरे-धीरे गर्म हो रही,
शीत धूप की
तंद्रिल देह,
कुछ-कुछ तपने लगी दुपहरी,
यह अनुभूत रहा
संदेह.
कलिकायुक्त
टहनियों से मन
बहलाता है, मदिर समीर |
वासंतिक इन
आवरणों के,
बदल रहे
पृष्ठों के खोल,
नई व्यंजना ने
पहना है,
लेखन का जामा
अनमोल,
किन्तु गगन की
ओर झाँकता,
साखी रचता पुन: कबीर |
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