टोले का उमराँव

प्रगति निगलती रही धूप को,

बन कर वट की छाँव |

 

दुखड़ों के हाथों ने बेचे,

खेती, फसल, जमीन,

दुखिया की फटही साड़ी की,

कथरी सिले मशीन,

बिजली की चंबल में डूबा,

दीयों का हर गाँव |

 

चकबंदी से हुई इकट्ठी,

हर किसान की जोत,

आमदनी ने बढ़ा दिया है,

सुख-सुविधा का स्रोत,

ऊँची एड़ी की जूती में,

फुलबसिया के पाँव |

 

ताप नियंत्रित घर में सोती,

रंग-बिरंगी छींट,

टाइल की रौनक से चिपटी,

भट्ठेवाली ईंट,

छाती ताने चलता है अब,

टोले का उमराँव’ |

 

नहीं बचा है, बोने लायक

एक इंच भी खेत,

रामउजागरबेच रहा है,

गंगाजी की रेत,

पुलिया पर बैठे रहते है,

शहरीपन के दाँव |

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