पैसे हों तो
जाते हो बाजार, सही है,
घर में केवल
भुना चना है,
ऋण का भी
ठहराव घना है,
लेते आना,
आटा-चावल-दाल-मसाला,
पैसे हों तो |
कई बार ऐसा होता है,
पैसा एक नहीं
होता है,
और न होता
दाना घर में,
काम करो तो दिन
कटता है,
धूप-छाँह की छावनियों में,
आदर बनता ताना
स्वर में,
जीवन रोज
कमाना-खाना,
दिन प्रतिदिन
इस तरह बिताना,
गाँठ बाँध लो, भूल न जाना,
लेते आना,
आटा-चावल-दाल-मसाला,
पैसे हों तो |
ठाकुर के घर
कातिक में जो
काम किया था, उसका पैसा
अबतक वहीं
उधार पड़ा है,
मक्का मँगरू
का लौटाना,
जो सावन में
कर्ज लिया था,
सिर पर
साहूकार खड़ा है,
कुआँ खोदकर
खर्च चलाना,
सूरज डूबे पर
घर आना,
बातें हँसकर, टाल न जाना,
लेते आना,
आटा-चावल-दाल-मसाला,
पैसे हों तो |
एक इंच भी
भूमि नहीं न,
कहीं पड़ी है
इस धरती पर,
जिस पर खेती
कर सकते हैं,
एक धूर न खेत
बँटाई,
लिया कहीं भी
ऊसर-बाँगर,
जिससे कर्जा
भर सकते हैं,
छोटे बच्चे
बड़े हो रहे,
आठ पैर हैं
खड़े हो रहे,
यह ही मन को
है समझाना,
लेते आना,
आटा-चावल-दाल-मसाला,
पैसे हों तो |
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