इंद्रप्रस्थ की दिल्ली

आग लगाकर शहरों-शहरों,

चुप माचिस की तिल्ली |

 

लोकतंत्र की सड़कों पर है,

अराजवीजी छाया,

संविधान के रक्षक रव की,

सजग कौलई काया,

जाना चाह रही है किस पथ?

स्वार्थवाद की बिल्ली |

 

उग्रवाद की खुली हुई उस,

खिड़की में तो झाँकों,

शोरतंत्र ! मानवतावादी,

कल को कम मत आँको,

राष्ट्रवाद का अर्थ समझ लो,

! बरसाती झिल्ली |

 

कहाँ धर्म-निरपेक्ष रह गये,

धर्म-निष्ठ जो नाते,

एक वोट के लिये बंद हैं,

रामराज्य के हाते,

स्वयं-सिद्धि के लिये गड़ी है,

वोट-वाद की किल्ली |

 

लोकतंत्र के महाकाव्य में,

अधिकारों का हल्ला,

कर्तव्यों से विमुख हो गया,

नागरता का पल्ला,

तत्पर गौरव की रक्षा में,

इंद्रप्रस्थ की दिल्ली |

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