मुनकिया
खोंट रही है साग ‘मुनकिया’,
लगा चना का होरा |
खेतों के उन
खर-पातों का,
स्वयं सोहती
मोथा,
मनभावन हर पथ्य बनाती,
खिंचड़ी-महुअर-चोथा,
बच्चा कहीं
सुला देती है,
निडर बिछाकर
बोरा |
मूँग दाल की
बरी बनाती,
कहती जिसे
मुँगौरी,
कभी उड़द को
पीस शिला पर,
पारे स्वादु अदौरी,
डाल सुई में
साठा देती,
बिन चश्मा भी
डोरा |
कभी तोड़ लाती
तालों से,
खाने योग्य
सिंघाड़े,
हर
उत्तरदायित्व निभाती,
खर्च न आते
आड़े,
दूध गाय का पी
जाती है,
छोटा एक कटोरा |
घियातरोई है
पसंद,पर
बथुआ मन
ललचाता,
तोरी, लौकी, भिंडी खाती,
बैंगन रास न आता,
रोगमुक्ति के
उसके साथी,
पालक, बीन्स, परोरा |
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें