जिसमें जनसमाज का हित है
राजनीति के गंधर्वों ने
सेवा के उस
मानचित्र का,
बदल दिया
भूगोल,
जिसमें जनसमाज
का हित है |
भ्रष्टाचार
मिटाने को तो
कहते, क्या तैयार?
वर्षों से ही
यह जुमला है
बना कवच, हथियार,
वादों का यह
आवेष्टन तो,
कलई भर है बस
राँगे का,
या चाँदी का
रोल,
होता जिसमें
स्वार्थ निहित है |
समाजवादी बरगद
के घर,
बैठा पूँजीवाद,
बात गरीबी की
करता है,
कुरसी का
अनुवाद,
झूठतंत्र के
फुसलावे में,
है चुनाव का
हर मतदाता,
जनमत डावाडोल,
जनता चारों
खाने चित है |
कथनों में हैं आकर्षण के,
विज्ञापन
अभिज्ञान,
अनुमानित
लक्ष्यों की चरचा,
श्रेयस्कर उपमान,
संदर्भों के इन पीपों में,
घृणा-वैर की एक विषैली
गैस, भरी अनबोल,
बात आजकल
सर्वविदित है |
एक शब्द के कई
अर्थ हैं,
और कई पर्याय,
बटमारों की
बस्ती में है,
वोट-दान की गाय,
भाँप भंगिमा
भाव-दशा की,
भरते मन के
कारुण्यों में,
एक कंप, भूडोल,
जनतंत्रात्मक भूमि
भ्रमित है |
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