आँगन बैठी धूप
कहाँ बिछौना-लेवा सीती,
आँगन बैठी धूप |
खेतों की भी
उखड़ गई हैं,
ऊँची गड़ी
मचानें,
उजड़ गये हैं
थपुए-नरिए,
लोप हुई हैं
छानें,
मिलती कहीं न हुक्का
पीती,
आँगन बैठी धूप |
नहीं गाँव में
बाल काटने,
आती आज, हजामत,
कसबों में
सैलून खुले हैं,
शहरी हुई
नियामत,
दुर्दिन के
सपनों में जीती,
आँगन बैठी धूप |
घेर और घर से
है ओझल,
गाय-भैंस की छाया,
शुद्ध दूध बिन
सुबह तरसती,
दुखित शाम की
काया,
दुख की लाल
मिरिच है तीती,
आँगन बैठी धूप |
छलनी अभी
रसोईघर की,
बनी हुई है
रानी,
छाज दुबक ताखे
पर लटका,
उतर गया है पानी,
अपनी गाथा
गाती बीती,
आँगन बैठी धूप |
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