घर जाने दो

यह कहना है,! कोरोना !!

और मौत से मत डरवाओ,

घर जाने दो |

 

लगी भूख को हम सह लेंगे,

अभी नसों में दम है बाकी,

रोटी बिन हम नहीं छछनते,

साथी है जब वाकीटाकी,

बुझी आग जो अंतड़ियों की,

तुम कपूर से मत सुलगाओ,

घर जाने दो |

 

पैदल चलने की लत हम में,

हम दुख के पत्थर ढोए हैं,

श्रम के झंडे को फहराकर,

पथरीली भू पर सोए हैं,

अपनी हर झाँसापट्टी से,

बन कर आँधी मत धमकाओ,

घर जाने दो |

 

बंद रहे हम अपने घर में,

अफवाहों ने हमें छकाए,

भारी मन से और दुखी हो,

निकल सड़क पर कल हम आए,

तुम में असह भयानकता है,

भय का गर्म न दूध पिलाओ,

घर जाने दो |

 

सहमे हुए शहर के घर के

हैं दरवाजे बंद, डरे हैं,

सामाजिकता की दूरी की

बोली-बोली छंद, धरे हैं,

समझ चुके हैं और नहीं तुम,

उड़ी हवा से अब ओसाओ,

घर जाने दो |

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