वार्ता के संवाद
रहते मत वैभिन्य निरर्थक,
वार्ता के
संवाद |
माँगों के हर
विज्ञापन का,
पीठ चढ़ा वैताल,
फैल गया है
कुंठाओं का,
तर्कहीन शैवाल,
है हठता पर
अड़ी हुई यह,
शाहिन की
बकवाद |
अभिव्यंजन का
बना हिमालय,
अधिकारों का
भोर,
छिपी हुईं कुछ
छद्म शक्तियाँ,
अजमाती हैं
जोर,
चाह रही हैं हिल
जाए कुछ,
संसद की
बुनियाद |
जो भी मुख से
शब्द निकलते,
लगते उलटे
अर्थ,
ऐसे लोगो के
आगे है
बीन बजाना
व्यर्थ,
जो अपने हित
की भाषा में,
करते हैं अनुवाद |
नहीं अटल है
किसी बात पर,
अवहेलन का
झुंड,
समाचार माध्यम
को भी ये,
गिनवाता है
मुंड,
कब तक होगा
अंत? न निश्चित,
अनुप्रेरित
प्रतिवाद |
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