बुटइया के पिताजी !

कर्ज का जो बोझ देकर,

मौत के मुँह में गए हैं,

आज से छ: माह पहले,

वह, बुटइया के पिताजी !

आज तक सिर पर खड़ा है |

 

जेब के खर्चों ने खाए,

खेत के गुंजार,

हैं बसाए भी नहीं कुछ,

बचत के संसार,

नहीं घर में अन्न-पानी,

और पशुओं की न सानी,

है पड़ा खाली भगोना,

धन नहीं कोई, न सोना,

छौंड़ के नीचे गड़ा है |

 

चाँद-सूरज चक्करों में,

हो गए हैं व्यस्त,

लिख गया है नाम उनके

उदय, होना अस्त,

झाँकता है खिड़कियाँ हल,

और प्यासा है खड़ा नल,

चैन आँगन में छ्छ्नता,

दूर बैठी है निकटता,

भूख का जबड़ा बड़ा है |

 

कल महाजन के कारिंदे,

आ गये थे पाँच,

दब गया था धमकियों में,

एक नैतिक साँच,

कर रहे थे बात ऐसी,

सत्यता जिसमें नहीं है,

और वह घर की बनावट

नींव चाँदी की भरी है

भित्ति में मोती जड़ा है |

 

धर्मत: तो है चुकाना

कर्ज का यह भार,

जोड़ना है कठिन श्रम से,

योजना का तार,

लोग कहते हैं कहावत,

बात सच है यह, यथावत,

कथन यह ऐसा न वैसा,

है न कोई पेड़ ऐसा,

जहाँ से पैसा झड़ा है |

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