नई फसल की चकाचौंध
कोसी के कछार पर गाती,
सरसों फगुआ का
नवगीत,
बिछा पुआल |
सागर की रेती पर लहरों
की होती
घुड़दौड़,
तुरही ढोल-झाल सँग गुनती,
राग भैरवी-गौड़,
आसमान तक गूँज
रहा है
बरसों से कलकल संगीत,
उड़ी रुमाल |
नई फसल की
चकाचौंध है,
मचल रही है
खेप,
सजी मशीनों की
दँवरी का,
कट सकता है
टेप,
मास राशिफल
में न घुसे वह,
नरसों तक पचखा अवगीत,
सुनो भुआल !
मनमौजी हो गईं
दिशाएँ
और उड़ातीं चैन
बाघागोटी खेल
रही है
तरबूजों सँग
रैन
आशाओं के
आसमान में,
होली का भी
होलिकोत्सव है,
परसों ही जनेव-उपवीत
मगन गुलाल |
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