कल शहर वीरान सा था

कल शहर वीरान सा था,

आज वह चलने लगा है |

 

आग से घिरते घरों की,

छत बहुत सहमी हुई थी,

गगन में काला धुआँ था,

हवा बेरहमी हुई थी,

कहर का टीला बना जो,

बर्फ वह गलने लगा है |

 

संशयों की ठण्ड में तो,

भय भरा घन आवरण था,

आँधियों का पथ असंगत,

जन-विरोधी व्याकरण था,

जो हुआ, जितना हुआ, पर,

ताव वह ढलने लगा है |

 

राह अपनी ढूँढ़ते हैं,

कुर्सियों के स्वर समुच्चय,

दृष्टि पैनी रख रहे हैं,

राष्ट्र के धृतराष्ट्र संजय,

ताड़ पर अधिकारवाला,

आम वह फलने लगा है |

 

तीव्रता क्यों शोरगुल की,

मार्ग से भटकी हुई है,

राजनीतिक क्रोध-मूर्छित,

द्वंद्व में अटकी हुई है,

सत्य के समझाव का अब,

दीप वह जलने लगा है |

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