इतने दिन, कहाँ रहे

 सागर सूख गये आँखों के,

इतने दिन, कहाँ रहे?

 

आशावादी पोखरियों में,

एक बूँद भी बचा न पानी,

एक कुतूहल अंदर बैठा,

करता है वह काना-कानी,

देवी-देवों की ड्योढ़ी पर,

गुजरे वर्ष कई भाँखों के,

इतने दिन, कहाँ रहे?

 

वादों के हर शब्द झिझकते,

भट्ठी के हैं अब तो झाँवाँ,

जहाँ स्नेह का धान उपजता,

वैर उगा अनचाहा साँवाँ,

संबंधों के जहाँ चचींडे,

लच्छे टूट गये झाँखों के,

इतने दिन, कहाँ रहे?

 

मेलजोल के उस फागुन के,

माने बदल गये हैं अब तो,

स्नेहिल ध्रुवता की छींबी के,

दाने बदल गये हैं सब तो,

मन पाँखी के स्वर बदले हैं,

जाँगर थके हुये हाथों के,

इतने दिन, कहाँ रहे?

 

हुलसित और नये लमहों के,

दिन हैं लौट न पाए फिर से,

अनुकरणात्मक उन ध्वनियों के,

साये उतर गए हैं सिर से,

बदला समय, समय के सँग ही,

पंछी लुप्त हुए शाखों के,

इतने दिन, कहाँ रहे?

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