कुरसी चुप है
खाली हाथ निवेदन भेजा,
दुःखी पेट जो
रहता भूखा,
कुरसी चुप है |
रोजगार
कार्यालय में हल,
कहाँ निकलता
है?
जमा हुआ
हिमखंड भूख का,
कहाँ पिघलता
है?
बिजली के भी
उजियारों में,
सब गुपचुप है |
पड़ी कोकई मेज
उसी पर,
लेटी है गरिमा,
कब होगा
निबटारा यह तो,
मालिक की
महिमा,
आशामुखी
ज्योतिर्मय झालर,
बस लुप-लुप है |
लेनदेन की
दीवारों में,
होती है चरचा,
एक बँधे पत्ते
का कहते,
होता है खरचा,
नई सदी के
धृतराष्ट्रों का,
शासन घुप है |
एक पारदर्शी
कपड़े की,
झीनी चादर से,
घिरी हुई है
जटिल व्यवस्था,
ठहरे बादर से,
जहाँ समय ने
पैर रखा है,
जल छप-छुप है |
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