इमली और पके कुछ बेर
कसबा खुश है, पैंठ लगी है,
बुढ़िया बेच
रही है इमली
और पके कुछ बेर
|
गोर कलाई सूनी-सूनी,
नहीं कड़ा या
चूड़ी,
मौसम कुछ-कुछ साफ-साफ, पर
कँपा रही है
जूड़ी,
ग्राहक नहीं, अनिश्चय में कल
और समय का पतलापन
भी,
बढ़ा रहा है
देर |
कुछ पत्ते हैं
महुआवाले
और पड़ीं कुछ
सींकें,
शीत लहर का
असर इस तरह,
अधिक कष्ट में
छींकें,
सूरज भी छिपनेवाला
है,
सौदे में इतनी
सुस्ती है,
बिके नहीं हैं
ढेर |
नुक्कड़ के
कोने पर बैठी,
घर की दीया-बाती,
आगे नाथ न
पीछे पगहा,
और नहीं कुछ
थाती,
साँस उखड़ जाती
है रह-रह,
कड़ी ठण्ड में
ठिठुर रहा है,
थके दिनों का
फेर |
..
जुड़ी- एक
ज्वर, जिसके आने से पहले रोगी का जाड़ा का अनुभव होता है |
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