सूरज भागा गाँव

पारा सिकुड़ गया सरदी में,

मौसम की जब डाँट पड़ी तो,

सूरज भागा गाँव |

 

किरणें धुंधों के चंगुल में,

पड़ी हुई हैं कैद,

धूप लगाती है इंजेक्शन,

दवा लिख रहा वैद,

खेत अलाव जलाकर जीता,

रेता ठंडाई है पीता,

अँगुरी मोजा पहन रही है,

ठिठुर गया है पाँव | 

 

आँच पकौड़ी तलने खातिर,

तन मन से तैयार,

प्याज पाव भर लेने महँगी,

गई हुई बाजार,

पेड़ों के पत्तों पर सोई

ओस अनमनी ओढ़े लोई,

एक टाँग पर खड़ी हुई है,

छतरी ताने छाँव |

 

दरवाजा भी बंद पड़ा है,

ढँका बर्फ से गेह,

बादल फाटक नहीं खोलता,

साँसत में है देह,

खुली सड़क पर वाहन अटके,

गुलूबंद लटकाये पटके,

पंछी दुबक रहे कोटर में,

कौवे करते काँव |

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